सबसे पहले तो यह समझने की जरूरत है कि भारत की शिक्षा प्रणाली को बदलने की नहीं उसमें सुधार करने की जरूरत है। युवाओं के बीच कौशल की कमी देश में बेरोजगारी की उच्च दर के कारणों में से एक है। और जब हम भविष्य के कार्यों के विषय में सोचते हैं कि भविष्य में भारत की बढ़ती युवा आबादी के लिए नौकरियां सृजित की जाएगी तो सब कुछ ध्यान में रखते हुए हमें एक विचार को प्राथमिकता देनी होगी कि ज्यादातर बच्चे जो वर्तमान में प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं और साथ ही वे आजीविका के लिए विभिन्न ऐसे रोजगार कार्यों में भी संलग्न है जो अभी तक मौजूद नहीं है या पहली नजर में एक कठिन अवधारणा प्रतीत हो सकती है। उदाहरण के तौर पर आज भारत चार मिलियन एप डेवलपर का घर है यानी एक ऐसा कार्य क्षेत्र जो कुछ पहले या तीन दशक पूर्व अस्तित्व में नहीं था इसी प्रकार बहुत कम समय में ही दक्षिण अमेरिका में एक नदी के रूप में प्रचलित अमेजॉन खुदरा विक्रेताओं में से एक के रूप में उभर कर सामने आया है यह समझ में परिवर्तन तकनीकी प्रगति का परिणाम है। सुधार की जरूरत एक अच्छी शिक्षा प्रणाली के लिए है। हमारे देश के स्कूलों कॉलेजों में ऐसी बहुत सी चीज नहीं पढ़ाई जाती या इतनी लेट से पढ़ाई जाती है कि जब उसका महत्व ही खत्म हो जाता है।
वर्ष 2030 तक भारत में विश्व में सर्वाधिक युवा आबादी होगी युवा आबादी का यह विशाल आकार तभी वरदान सिद्ध होगा जब यह युवा कार्य बल में शामिल होने के लिए पर्याप्त कुशल होंगे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा इन में प्रमुख भूमिका निभायेगी। लेकिन शिक्षा की वर्तमान स्थिति उपयुक्त अब संरचना की कमी शिक्षा पर निम्न सरकारी व्यय और छात्र शिक्षा का अनुपात की विषमता जैसी प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रही है। इस प्रकार या उपयुक्त समय है कि भारत शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जाए और ऐसा आधुनिक शिक्षण दृष्टिकोण अपनाया जाए जो उत्तरदाई एवं प्रसंगिक हो।
भारत के शिक्षा छेत्र में समस्याएं क्या हैं?
- UDISE यानी एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली 2019-20 के अनुसार केवल 12% स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा और केवल 30% में कंप्यूटर उपलब्ध है। इनमें से लगभग 42% स्कूलों में फर्नीचर की कमी 23% में बिजली की कमी थी 22 प्रतिशत में शारीरिक रूप से निशक्त के लिए रैंप की कमी थी और 15% में जल सफाई एवं स्वच्छता सुविधाओं की कमी थी। यह आंकड़े हमें स्कूली शिक्षा व वहां की सुविधाओं और उसमे कमी की जानकारी देते हैं।
- प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर विद्यालय छोड़ने की दर बहुत अधिक हो गई है। 6 से 14 आयु वर्ग के अधिकांश छात्र अपनी शिक्षा पूरी करने से पहले स्कूल छोड़ देते हैं। इससे विद्या और मानव संसाधनों की बर्बादी की स्थिति बनती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 के अनुसार 2019-20 में स्कूल वर्ष से पहले 6 से 17 आयु वर्ग की 21.4% बालिकाओं और 35 पॉइंट 7% बालकों ने स्कूल छोड़ने के पीछे का मुख्य कारण पढ़ाई में रुचि न होना बताया।
- आईआईटी और आईआईएम जैसे शिष्य संसाधनों में प्रवेश पाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण भारत में बड़ी संख्या में छात्रों के लिए एक चुनौती पूर्ण शैक्षणिक वातावरण का निर्माण किया गया है। इसे फिर भी शिक्षा के लिए विदेश जाना पसंद करते हैं जिस देश अच्छे प्रतिभा से वंचित हो जाता है। भारत में निश्चित रूप से शिक्षा का मात्रात्मक विस्तार हुआ है। लेकिन गुणात्मक मोर्चे में यह पिछड़ा हुआ है।
- भारतीय भाषाएं अभी भी आ विकसित अवस्था में है विशेष रूप से विज्ञान विषयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है जिसके परिणाम स्वरुप ग्रामीण छात्रों के लिए आसमान अवसर की स्थिति बनती है इसके साथ ही भारतीय भाषाओं में मानक प्रकाशन उपलब्ध नहीं है जिससे छात्र-छात्राओं की रुचि खत्म होने लगते हैं और वे स्कूल छोड़ते हैं।
- हमारी शिक्षा प्रणाली मुख्यतः समानग्य प्रकृति की है। तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा का विकास पर्याप्त असंतोष जनक है जिसके कारण शिक्षित बेरोजगारों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। ग्रामीण स्तर पर निम्न आय के कारण शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती है जागरूकता एवं वित्तीय स्तरीय स्थिरता की कमी के कारण कई माता-पिता शिक्षा को निवेश के बजाए खर्च के रूप में देखते हैं। में बच्चों को शिक्षा दिलाने के बजाय चाहते हैं कि उनके बच्चे कम करें और पैसे कमाए। उच्च शिक्षा के मामले में आसपास अच्छे संस्थानों की कमी छात्रों को शेरों का रुख रखने के लिए विवश करती है जिससे अभिभावकों का खर्चा बढ़ जाता है और सामर्थ्य की समस्या के कारण नामांकन की निम्न डर जैसा परिणाम प्राप्त होता है।
- एक आखरी कारण के रूप में देखा जा सकता है कि समाज में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शिक्षा के अवसर की समानता सुनिश्चित करने के सरकार के प्रयासों के बावजूद भारत में महिलाओं की साक्षरता दर विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बदतर है। संयुक्त राष्ट्रीय बालकोष के अनुसार गरीबी और स्थानीय संस्कृत को प्रथाएं पूरे भारत में शिक्षा क्षेत्र में लैंगिक असमानता के निर्माण में एक बड़ा भूमिका निभाती है। शिक्षा में एक और बड़ा देश भर के स्कूलों में व्याप्त स्वच्छता की कमी भी उत्पन्न करती है।
बदलाव की आवश्यकता
शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जहां कभी भी एक प्रणाली को निरंतर बढ़ाया नहीं जा सकता शिक्षा में समय-समय पर बदलाव या सुधार जरूरी है। यदि शिक्षा में सुधार नहीं की जाएगी तो हम पुराने पिछड़े विचारों और प्रणालियों को लेकर नई-नई तकनीक से डील नहीं कर पाएंगे। छात्रों को व्यवहारिक लर्निंग अनुभव प्रदान करने के लिए और कार्य बल में प्रवेश के समय उन्हें बाहरी दुनिया का सामना करने हेतु तैयार करने के लिए समस्या समाधान और निर्णय लेने से संबंधित विषयों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की आवश्यकता है। अनुभव आत्मक अधिनियम यानी एक्सपेरिमेंट लर्निंग प्रत्येक छात्र से सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर सकते कि अपनी क्षमता से अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकता है जो बदले में उनकी संवेगात्मक बुद्धिमत्ता को प्रेरित करता है और उन्हें आत्मा शिक्षक के मार्ग पर आगे बढ़ता है। कृत्रिमूद्धता यानी AI की शैक्षिक क्षेत्र से संबंध करने के भी अनुभवात्मक अधिगम को बल मिलेगा।
सरकार की नई शिक्षा प्रणाली नप के कार्य वंश से शिक्षा प्रणाली को उसकी नींद से जगाने में मदद मिल सकती है। क्योंकि NEP का उद्देश्य भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनना है। उल्लेखनीय है की स्वतंत्रता के बाद से भारत में शिक्षा के ढांचे में सुधार के अधिक प्रयास नहीं हुए हैं और यह इस क्रम में केवल तीसरा बड़ा सुधार ही है। इसका उद्देश्य एक खुली स्कूली प्रणाली के माध्यम से दो करोड़ बच्चों को पुनः मुख्य धारा में वापस लाना है। मान्यता के एक नए ढांचे और सार्वजनिक एवं निजी दोनों तरह के स्कूलों को विनियमित करके एक स्वतंत्र प्राधिकरण के साथ विद्यालयों का प्रशासन अब रूपांतरित हो जाएगा। 360 डिग्री समग्र प्रगति कार्ड के साथ मूल्यांकन के तरीके में सुधार किया जाएगा और लर्निंग आउटकम की प्राप्ति के लिए छात्र प्रगति पर नजर रखी जाएगी। इसके अलावा इंटर्नशिप के साथ व्यावसायिक शिक्षा कक्षा 6 से शुरू होगी। यह नई शिक्षा प्रणाली भारत को शिक्षा के क्षेत्र में एक अच्छा स्थान प्रदान कर सकता है। भविष्य की ओर देखना महत्वपूर्ण है लेकिन साथ ही हमें अपनी गहरी जड़ों को भी मन में बनाए रखना चाहिए। प्राचीन भारत की गुरुकुल प्रणाली से बहुत कुछ सीखा जा सकता है जो सदियों पहले एकेडमिक शिक्षा के बजाय समग्र विकास पर केंद्रित थीं। प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में नैतिकता एवं मूल्य परक शिक्षण अधिगम या लर्निंग के मूल में रही थी आत्मनिर्भरता समानुभूति रचनात्मक और अखंडता जैसे मूल्य प्राचीन भारत में महत्वपूर्ण रहे थे जो आज भी प्रासंगिक है। प्राचीन काल में शिक्षा मूल्यांकन विषयगत ज्ञान के वर्गीकरण ताकि सीमित नहीं था छात्रों का उनके द्वारा सीखे गए कौशल और वास्तविक जीवन स्थितियों में व्यावहारिक ज्ञान को आजमा सकते की क्षमता के आधार पर मूल्यांकन किया जाता था।





