23 जून, 1980 की सुबह 07:58 बजे संजय गांधी धीरेंद्र ब्रहमचारी के टू सीटेड विमान पिट्स एस 2ए से अपनी अंतिम उडान भरे थे। विमान संजय गांधी ही उडा रहे थे और उनकी बगल में दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना बैठे थे। विमान को रिहायशी इलाके में उडाने की मनाही होती है मगर संजय गांधी को भला कौन रोकता। रिहायशी इलाके में ही संजय गांधी ने तीन लूप लगाए मगर चौथे लूप में विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया और विमान तेजी से नीचे गिरते हुए अशोका होटल के पीछे गुम हो गया।
थोडी ही देर में ये खबर आई कि विमान दुर्घटना में संजय गांधी और सुभाष सक्सेना दोनों की मृत्यु हो गई है। संजय गाँधी की शौक ही उनकी मृत्यु का कारण बनी। गौरतलब है कि संजय गांधी को साल 1976 में हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला था मगर जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उनके लाइसेंस को निलंबित कर दिया गया। कांग्रेस के सत्ता में लौटने पर संजय गांधी ने फिर से लाइसेंस हासिल कर लिया था।
इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र ही उनका उत्तराधिकारी बनेंगे ये पहले से ही तय हो गया था। देश में इमरजेंसी 25-26 जून,1975 को लगी। इंदिरा गांधी पर जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख्त कानून बनाने का भारी दवाब था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और बहुत से विकसित देश जो विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से भारत की सहायता कर रहे थे, वे चाहते थे कि भारत कडाई से जनसंख्या नियंत्रण करे। अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते भारत में काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण की कई कवायदें चल भी रही थीं। गर्भ निरोधक गोलियों सहित कई तरीके अपनाए जा रहे थे लेकिन इनमें कोई खास सफलता नही मिलती दिख रही थी।
एक धर्म विशेष के लोगों ने तो जनसंख्या नियंत्रण के किसी भी साधन को अपनाने से इंकार कर दिया था। अशिक्षा और अनपढ़ धार्मिक गुरू के कहने पर एक वर्ग विशेष के लोगों को लगता था कि सरकार उनकी आबादी को घटाना चाह रही है। इस वजह से एक समुदाय विशेष के एरिया, मुहल्ले और गाँवों में ये कार्यक्रम बुरी तरह असफल हो रहा था। इंदिरा गांधी अपने लाडले संजय गांधी को राजनीति में जोरदार तरीक़े से स्थापित करना चाहती थीं, इस वजह से उन्होंने वृक्षारोपण, दहेज उन्मूलन और नशाबंदी जैसे लोकप्रिय सरकारी कार्यक्रमों से इतर नसबंदी जैसे चुनौतीपूर्ण कार्यक्रम का जिम्मा संजय गांधी को सौंपा। संजय गांधी को भी एक ऐसे मुद्दे की तलाश थी जो उन्हें कम समय में एक सक्षम और प्रतिभाशाली नेता के रूप में स्थापित कर सके।
इमेरजेंसी के समय जब सत्ता इंदिरा गांधी के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो गई थी तब पश्चिमी देशों चाहते थे कि इंदिरा गाँधी नसबंदी को बेहद प्रभावशाली ढंग से और सख्ती से लागू करें, नही तो उन्होंने ये धमकी दी थी कि खाद्यान्न पर मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता रोक दी जाएगी। आजादी के बाद से भारत में जितना कृषि उत्पादन होता था वह आबादी के हिसाब से नाकाफी साबित हो रहा था। कृषि योग्य भूमि उतनी ही थी मगर खानेवाले रोज बढ़ रहे थे।
नसबंदी जैसा प्रयोग भारत में नया नही था। इससे पहले ये प्रयोग सफलतापूर्वक केरल में हो चुका था। साल 1970 के अगस्त के महीने में कोचीन में डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट सेमिनार का आयोजन किया गया। इसमें एर्नाकुलम जिले को माँडल जिला बनाने के लिए एक मसौदा तैयार करने के लिए सुझाव मांगा गया। इसी मसौदे में एक जनसंख्या नियंत्रण के लिए स्वेच्छा से नसबंदी कराने की मांग की गई, जिसे वहां के लोगों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। उस समय एर्नाकुलम जिले में तीन लाख शादीशुदा जोडे थे, जो इस प्रोग्राम के तहत आने के लायक थे। लक्ष्य तय किया गया कि पाँच सालों में स्वेच्छा से, बिना किसी दवाब के ये जोडे नसबंदी कराएंगे। नसबंदी के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए नसबंदी मेला लगाया गया, जिसमें लोगों को जानकारी दी गई।
नसबंदी के लिए पुरूषों को इसलिए चुना गया कि पुरूषों में नसबंदी तुरंत और बिना एडमिट के हो जाती थी। समय और खर्च की बचत थी। लोग कैंप में आने लगे और सफलतापूर्वक नसबंदी का कार्यक्रम चलता रहा। नसबंदी कार्यक्रम को प्रोत्साहित करने के लिए पुरूषों को 114 रू और महिलाओं को 135 रू दिया जाता था।
नसबंदी कार्यक्रम को लागू करते समय इंदिरा जी के जेहन में ये बात जरूर थी। संजय गांधी ने इस चैलेंजिंग प्रोग्राम को देश की राजधानी के पुरानी दिल्ली ऐरिया से शुरू करने का निश्चय किया, जहाँ एक वर्ग विशेष की बहुसंख्यक आबादी थी जो इस कार्यक्रम को फेल करने में लगा था। मुस्लिम बहुलता वाले इलाके में जितना विरोध होता, उससे दुगुनी ताकत से इस कार्यक्रम को लागू करवाया जाता।
देश भर में नसबंदी कार्यक्रम लागू कर दिया गया और अधिकारियों को टारगेट दिया जाता था। जो उस टारगेट को पाने में कामयाब नही होता उसे ससपेंड किया जाने लगा। अधिकारियों के टारगेट को पूरा करने के लिए लोगों को पकड पकड के बंध्याकरण किया। कभी शिकायत मिलती कि नाबालिग का नसबंदी हुआ है तो कभी ये रिपोर्ट आती कि किसी बुढे-बुजुर्ग को जबरन पकड कर नसबंदी कर दिया गया। सारे देश में हाहाकार मच गया था। अधिकारी संजय गांधी के नाम से कांपने लगे थे।
संजय गांधी के सर पर नसबंदी का ऐसा जुनून छा गया कि उनकी तुलना हिटलर से होने लगी। हिटलर ने भी 1933 में एक ऐसा ही कार्यक्रम जर्मनी में लागू किया था। इसके तहत आनुवंशिक बीमारी से पीडित व्यक्ति का बंध्याकरण जबर्दस्ती किया जाता था। दरअसल हिटलर की ये सोच थी कि आनुवंशिक बीमारियाँ अगली पीढ़ी में न पहुँचे और जर्मनी बेहतर नस्ल वाला देश बने। बताते हैं कि जर्मनी में हिटलर ने साल 1933 में इतने जुल्म-ए-सितम नही किया था, जितना भारत में नसबंदी के दौरान हो गया। आपातकाल के खत्म होने के बाद देश में आम चुनाव हुए और इसमें कांग्रेस पार्टी की बुरी तरह हार हुई थी। नसबंदी को हार का प्रमुख कारण माना गया।
संजय गांधी की पुण्यतिथि 23 जून, पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।
अजय श्रीवास्तव (उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार)





