सीरम इंस्टीट्यूट ने अफ्रीका में लॉन्च की मलेरिया वैक्सीन

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के CEO अदार पूनावाला ने कहा, “मलेरिया के बोझ को कम करना आखिरकार नजर में आ गया है. ऑक्सफोर्ड और नोवावैक्स में हमारे पार्टनर्स के साथ सालों के अविश्वसनीय काम के बाद आज R21/Matrix-M™ वैक्सीन रोल-आउट की शुरुआत एक मील का पत्थर है.” सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा संयुक्त रूप से बनाई गई एक नई ‘हाई एफिसिएंसी’ वाली मलेरिया वैक्सीन सोमवार को ऑफिसियल तौर पर लॉन्च हुई. पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन से मंजूरी पाने वाली इस वैक्सीन के बारे में कहा जाता है कि यह एक हार्ड रेगुलेट्री प्रोसेस और क्लीनिकल जांच से गुजरी है. इसके अलावा इस वैक्सीन को काफी प्रभावी और किफायती पाया गया है. कम खुराक वाली वैक्सीन होने की वजह से इसे तेजी से और बड़े स्केल पर बनाया जा सकता है, जिसे मच्छर से जुड़ी बीमारी के फैलने से रोकने के लिए अहम माना जाता है.
‘मील का पत्थर है वैक्सीन का रोल-आउट…’
पूनावाला ने कहा, “मलेरिया के बोझ को कम करना आखिरकार नजर में आ गया है. ऑक्सफोर्ड और नोवावैक्स में हमारे पार्टनर्स के साथ सालों के शानदार काम के बाद वैक्सीन के रोल-आउट की शुरुआत एक मील का पत्थर है.” उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि हर व्यक्ति का अधिकार है कि उसे सस्ती और बड़ी बीमारी की रोकथाम तक पहुंच मिले. इसलिए हमने R21 की 100 मिलियन खुराक को प्रोड्यूस करने पर जोर दिया, जो लाखों जिंदगियां बचाएगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस घातक बीमारी के बोझ को कम करेगी. रोल-आउट पर बात करते हुए सीरम ने कहा कि उसने वैक्सीन की 25 मिलियन खुराकें बनाई हैं और इस आंकड़े को सालाना 100 मिलियन खुराक तक बढ़ाने की तैयारी है. बड़े पैमाने और कम लागत पर वैक्सीन देने के अपने उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, पुणे स्थित कंपनी ने कहा कि वह वैक्सीन को प्रति खुराक 4 अमेरिकी डॉलर से भी कम कीमत पर पेश कर रही है.
‘कई देशों में उपलब्ध होगी वैक्सीन…’
प्रोफेसर एड्रियन हिल ने कहा, “मलेरिया वैक्सीन का रोल-आउट, मलेरिया नियंत्रण इंटरवेंशन में एक नए दौर की शुरुआत को दिखाता है, जिसमें हाई इफेक्ट वाला टीका अब मामूली कीमत पर और बहुत बड़े पैमाने पर उन देशों में उपलब्ध है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. हमें उम्मीद है कि यह वैक्सीन बहुत जल्द उन सभी अफ्रीकी देशों को उपलब्ध कराई जा सकेगी, जो इसका उपयोग करना चाहते हैं.” मलेरिया वैक्सीन को यूनिवर्सिटी और SII ने नोवावैक्स की मैट्रिक्स-एम एडजुवेंट टेक्नोलॉजी का फायदा उठाते हुए संयुक्त रूप से तैयार किया. दिसंबर 2023 में, WHO ने इसे प्री-क्वालिफिकेशन का दर्जा दिया, क्योंकि ट्रायल्स से पता चला कि वैक्सीन को अच्छी तरह से सहन किया जा सकता है और इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द और बुखार के मामले में इसकी सेफ्टी प्रोफाइल अच्छी है.
हालांकि, मलेरिया से संबंधित मौतों की संख्या 2017 में 3,222 से घटकर 2020 में 1,316 हो गई है लेकिन देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, यह घातक बीमारी अभी भी हर रोज चार लोगों की जान लेती है, जिनमें ज्यादातर छोटे बच्चे होते हैं. वैक्सीन की कुल 656,600 खुराकें प्राप्त हुई हैं. शुरूआती चरण में 0 से 23 महीने की उम्र के 2,50,000 बच्चों को यह वैक्सीन लगाई जाएगी. वैक्सीन को घाना, नाइजीरिया, बुर्किना फासो और मध्य अफ्रीकी गणराज्य द्वारा भी ऑथराइज किया गया है.
R21, उप-सहारा अफ्रीका में RTS,S के बाद उपलब्ध दूसरा मलेरिया टीका है. मलेरिया टीकों के बड़े स्तर पर इम्प्लीमेंटेशन, मौजूदा रोकथाम तरीकों के अलावा हर साल कई हजार युवाओं की जान बचाने की उम्मीद है. कुल मिलाकर, साल 2024 में 15 अफ्रीकी देशों में मलेरिया के टीके शुरू होने की उम्मीद है. इन देशों की योजना 2024 और 2025 में करीब 6.6 मिलियन बच्चों तक मलेरिया का टीका पहुंचाने की है. नोवावैक्स के प्रेसिडेंट और CEO जॉन जैकब्स ने कहा, मलेरिया वैक्सीन की शुरुआत, पूरे इलाके में मौत के एक प्रमुख कारण से कमजोर बच्चों को बचाने की लड़ाई में एक बड़ी कामयाबी है. इसके साथ ही पब्लिक हेल्थ में सुधार करने वाले इनोवेटिव वैक्सीन बनाने के हमारे मिशन को भी बल मिलता है.”

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