सुप्रीम कोर्ट के अनुसूचित जाति एवं जनजाति आरक्षण में क्रीमीलेयर और कोटा के भीतर कोटा लागू करने के फैसले के खिलाफ आज 14 घंटे के भारत बंद का आह्वान किया गया है। नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइजेशंस (NACDAOR) ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को दलित और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए केंद्र सरकार से इसे रद्द करने की मांग की है। भारत बंद का मुख्य उद्देश्य इस फैसले को चुनौती देना और इसे वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना है। संगठन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। NACDAOR ने दलितों, आदिवासियों और ओबीसी से आज के शांतिपूर्ण आंदोलन में भाग लेने की अपील की है।
बंद का समर्थन करने वाले संगठनों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आरक्षण के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे वापस लिया जाना चाहिए। NACDAOR ने सरकारी सेवाओं में कार्यरत सभी एससी, एसटी और ओबीसी कर्मचारियों का जातिगत आंकड़ा जारी करने और न्यायिक सेवा के माध्यम से न्यायिक अधिकारी एवं जजों की नियुक्ति की मांग की है। साथ ही संगठन ने सरकारी सेवाओं में SC/ST/OBC कर्मचारियों के जाति आधारित डाटा को तत्काल जारी करने की मांग की है, ताकि उनका सटीक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने भारतीय न्यायिक सेवा आयोग की स्थापना की भी मांग की है, जिससे हायर ज्यूडिशियरी में SC, ST और OBC श्रेणियों से 50% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
आज के भारत बंद को कई राज्यों की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों का भी समर्थन प्राप्त है। इनमें समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी (काशीराम), भारत आदिवासी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, एलजेपी (R) समेत अन्य संगठन शामिल हैं। कांग्रेस ने भी इस बंद का समर्थन किया है।
सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले का हो रहा विरोध
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आरक्षण में क्रीमीलेयर और कोटा के भीतर कोटा से जुड़े मामले में फैसला सुनाया, जिसमें संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से कहा कि राज्यों को आरक्षण के लिए कोटा के भीतर कोटा बनाने का अधिकार है। इसका अर्थ है कि राज्य सरकारें अनुसूचित जाति और जनजाति श्रेणियों के लिए सब कैटेगरी बना सकती हैं, ताकि सबसे जरूरतमंद को आरक्षण में प्राथमिकता मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के अपने पुराने फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट किया कि SC के भीतर किसी एक जाति को 100% कोटा नहीं दिया जा सकता, और SC में शामिल जातियों के कोटे के लिए सटीक डेटा होना चाहिए। देश के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का कई संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है। उन्होंने इसे आरक्षण नीति के खिलाफ बताते हुए कहा कि इससे मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और सामाजिक न्याय की धारणा कमजोर हो जाएगी। विरोध करने वालों का यह भी मानना है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण उनकी तरक्की के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ हुई सामाजिक प्रताड़ना से न्याय दिलाने के लिए है।
आज भारत बंद: जानिए कौन-कौन से संगठन हैं शामिल





