दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में आम चुनाव हुए चार महीने हो चुके हैं, और अब चुनावी जोश केंद्र से हटकर राज्यों की राजनीति में प्रवेश कर चुका है। लेकिन, दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में इस समय चुनावी संघर्ष अपने चरम पर है। नए राष्ट्रपति के लिए चुनावी दौड़ में अब 10 दिन से भी कम का समय बचा है। इस चुनाव में उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच कांटे की टक्कर है। इस मुकाबले और उसके नतीजों पर अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति और उसकी नीतियां वैश्विक फैसलों पर असर डाल सकती हैं। माना जा रहा है कि दुनिया में जारी दो बड़े युद्धों की दिशा भी इससे तय होगी। दुनिया के सबसे ताकतवर पद के लिए दोनों प्रमुख उम्मीदवार, यानी कमला हैरिस और डोनाल्ड ट्रंप, अपनी पूरी शक्ति लगा रहे हैं। चुनावी प्रचार में आरोप-प्रत्यारोप और मतदाताओं को लुभाने के हर तरीके का जमकर उपयोग हो रहा है। नतीजों के बाद व्हाइट हाउस में कमला की जीत होगी या ट्रंप का पलड़ा भारी रहेगा, यह तो 5 नवंबर को होने वाले मतदान के बाद तय होगा। इस बीच अमेरिका में अर्ली वोटिंग का दौर तेजी से चल रहा है, जिसमें 30 करोड़ में से करीब 3 करोड़ मतदाता पहले ही अपना वोट डाल चुके हैं। इनमें पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और जिमी कार्टर भी शामिल हैं। ओबामा ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर डाक मत की प्रक्रिया भी समझाई है और लोगों से मतदान की अपील की है।
अमेरिका में चुनावी रेस को अक्सर कुछ विशेष राज्यों की लड़ाई माना जाता है। देश के 50 में से कई राज्यों में किसी एक पार्टी के रजिस्टर्ड मतदाता अधिक होते हैं, जिससे इनके नतीजे अपेक्षित रहते हैं। इनमें से कई राज्यों का रंग लाल (रिपब्लिकन) या नीला (डेमोक्रेट) होता है। लेकिन कुछ राज्यों को पर्पल (बैंगनी) स्टेट्स कहा जाता है, यानी जहां रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर होती है। इस बार एरिजोना, जॉर्जिया, मिशिगन, पेंसिल्वेनिया, और नॉर्थ कैरोलाइना जैसे 7 राज्य निर्णायक माने जा रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, इन स्विंग स्टेट्स में अर्ली वोटिंग में खासा उत्साह देखा गया है, और बड़ी संख्या में महिलाएं मतदान कर रही हैं। एरिजोना में रिपब्लिकन मतदाताओं ने, जबकि पेंसिल्वेनिया में डेमोक्रेटिक मतदाताओं ने डाक मत का उपयोग किया है। स्विंग स्टेट्स में अर्ली वोटिंग से दोनों उम्मीदवारों की स्थिति के संकेत भी मिलने लगे हैं।
अमेरिका में मतदान खत्म होते ही मतगणना शुरू होती है, और 24 घंटे के भीतर नतीजों की तस्वीर आमतौर पर साफ हो जाती है। लेकिन पेचीदा चुनाव प्रक्रिया के चलते यह हफ्तों तक भी खिंच सकता है। अमेरिकी संविधान के अनुसार, दिसंबर में दूसरे मंगलवार के बाद आने वाले पहले सोमवार को सभी राज्यों के इलेक्टर्स राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जुटते हैं। इस बार यह प्रक्रिया 17 दिसंबर को होगी और नए राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण 20 जनवरी को निर्धारित है।
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के साथ ही कांग्रेस और सीनेट के चुनाव भी होते हैं, और इसके बाद जनवरी की तीसरी तारीख को कांग्रेस का पहला सत्र होता है। 6 जनवरी को हाउस और सीनेट की संयुक्त बैठक होती है जिसमें इलेक्टोरल वोटों की अंतिम गिनती की जाती है। अमेरिका में चुनाव प्रक्रिया भारत की तरह ही होती है, जहां लोग एक निर्धारित केंद्र पर मतदान करते हैं या डाक मत से वोट डाल सकते हैं। बस अंतर यह है कि अमेरिका में अर्ली वोटिंग का विकल्प भी है।
साल 2020 के कोविड काल में हुए राष्ट्रपति चुनाव में रिकॉर्ड संख्या में डाक मत का उपयोग किया गया था, जिससे इस सुविधा की लोकप्रियता बढ़ी है। अब तय मतदान तिथि से पहले भी लोग एक निश्चित अवधि में मतदान कर सकते हैं, और 2.5 करोड़ से ज्यादा लोग पहले ही वोट डाल चुके हैं। अर्ली वोटिंग 4 नवंबर तक चलेगी।
अमेरिका में चुनाव से पहले ही पड़ गये तीन करोड़ वोट; 180 साल से लगातार 5 नवंबर को ही हो रहे हैं मतदान




