गांधी की हत्या : सह-अस्तित्व और समावेशी विचारधारा का कत्ल

30 जनवरी 1948, बिरला हाउस के बाहर प्रार्थना सभा में जाते निहत्थे इंसान के सीने में तीन गोली उतार दी जाती है और बापू हे राम… कहते हुए जमीन पर गिर पड़ते हैं। जब तक उन्हें उठाया जाता उनकी आत्मा, परमात्मा में विलीन हो चुकी थी। गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे वहीं पकड़ा जाता है और वह अपना जुर्म कबूल कर लेता है।
गांधी जी की हत्या से सभी हतप्रभ थे, किसी को समझ नहीं आ रहा था कि बापू की भला किस से दुश्मनी हो सकती है। गांधी तो अहिंसा के पुजारी थे भला उनकी जान किस मकसद से ली गई। हत्यारे नाथूराम गोडसे से पूछताछ हुई तो मकसद सामने आया। दरअसल हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उग्र धडा ये मानता था कि गांधीजी मुसलमानों के लिए अलग राज्य के विचार के समर्थक थे। वे मानते थे कि गांधी ही पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। पुलिस जांच में नाथूराम गोडसे ने ये भी कहा कि छद्म रूप से पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया फिर भी गांधी पाकिस्तान को देय 55 करोड़ रुपए की राशि जारी करने के लिए मजबूर करने हेतु उपवास कर रहे थे। हिंदू महासभा या संघ मानता था कि मुसलमानों की आक्रामकता गांधी की तुष्टिकरण की नीति का परिणाम है।
सच तो ये है कि गांधी ने हमेशा देश विभाजन का पुरजोर विरोध किया। 1946 के राष्ट्रव्यापी चुनाव में मुस्लिम लीग ने 90 प्रतिशत सीटें प्राप्त की। गांधी जी ने 05 अप्रैल 1947 को लाॅर्ड माउंटबेटन से कहा कि यदि अंग्रेज जिन्ना को प्रधानमंत्री बना दें और देश को ऐसे ही छोड़ दें तो भी वे सहमत होंगे। गांधी जी के प्रस्ताव पर माउंटबेटन ने जिन्ना से बात की मगर जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग से कम पर तैयार नहीं थे। देश भर में फैलते साम्प्रदायिक दंगों ने देश विभाजन को अपरिहार्य बना दिया था। आखिरकार गांधी को विभाजन की बात माननी पड़ी और कोई चारा भी नहीं था।
देश के गृहमंत्री सरदार पटेल ने 18 जुलाई 1948 को हिंदू महासभा के वरिष्ठ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने इस जघन्य हत्याकांड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा का सीधा हाथ बताया। उन्होंने लिखा कि हमें जो इनपुट मिल रहें हैं उसमें इन दोनों संस्थाओं का खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड़ संभव हो सका। मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी धड़ा षड़यंत्र में शामिल था।
सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के आठ महीने बाद 19 सितंबर 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक एम एस गोलवलकर को सख्त शब्दों में पत्र लिखा,”हिंदूओं का संगठन बनाना,उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रश्न है। हिंदूओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह जहर फैले। उस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधीजी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी और सावरकर व जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ न रही, बल्कि उनके खिलाफ हो गई। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने खुशी जताई और मिठाई बांटी। उससे यह विरोध और भी बढ़ गया और सरकार का इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी ही था।”
गृहमंत्री सरदार पटेल ने आरएसएस को यह पत्र उसके मुखिया गोलवलकर के पत्र के जवाब में लिखा था जिसमें आरएसएस पर बैन हटाने की मांग की गई थी। महात्मा गांधी हत्याकांड में शामिल दिगंबर बड़गे जो बाद में सरकारी गवाह बन गए थे अदालत में अपने लिखित बयान में कहा था कि नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे ने विनायक दामोदर सावरकर से मुलाकात की थी, जिसमें सावरकर ने उन्हें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और शहीद सुहरावर्दी को मारने की बात कही थी। हालांकि, अदालत में बड़गे के बयान की पुष्टि के लिए स्वतंत्र साक्ष्य की कमी के कारण सावरकर को दोषी नहीं ठहराया जा सका। हालांकि कपूर आयोग के सामने सावरकर के अंगरक्षकों ने बड़गे के बयान की पुष्टि की मगर तब तक सावरकर की मृत्यु हो चुकी थी।
हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों द्विराष्ट्र की बात करते थे। कवि मोहम्मद इकबाल जिन्होंने “सारे जहां से अच्छा हिंदूस्तां हमारा.. लिखा उन्होंने सबसे पहले मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की बात की। उस समय मोहम्मद अली जिन्ना भी उनसे सहमत नहीं थे मगर बाद में वो मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग के सबसे बड़े प्रणेता बने। 1937 में, अहमदाबाद में आयोजित हिंदू महासभा के खुले सत्र में सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, “आज भारत को एकात्मक और समरूप राष्ट्र नहीं माना जा सकता है, बल्कि इसके विपरीत मुख्य रूप से दो राष्ट्र हैं- हिंदू और मुसलमान।”
साल 1945 में सावरकर ने कहा था “मुझे जिन्ना के दो राष्ट्र सिद्धांत से कोई झगड़ा नहीं है। हम हिंदू अपने आप में एक राष्ट्र हैं और यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं।”
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत विकसित किए जो आधुनिक राजनीतिक आंदोलनों में अद्वितीय थे और गांधी के लिए अहिंसा केवल रणनीति नहीं थी। उन्होंने इसे एक राजनीतिक सिद्धांत का दर्जा दिया। यह वास्तव में पूरी मानवता के लिए महात्मा का अनूठा योगदान था। ब्रिटिश शासक भी गांधी के अहिंसा पर जोर देने से पूरी तरह चकित थे। “नंगा फकीर” दुनिया के सबसे शक्तिशाली शासकों के लिए सबसे बडी चुनौती बन गया था।
गांधी जी भारतीय राष्ट्रीय ढांचे के भीतर सभी धर्मों की सहिष्णुता और स्वीकृति में विश्वास करते थे। वे जानते थे कि एक आधुनिक राष्ट्र दूसरों के प्रति असहिष्णुता और उन्हें वहिष्कृत करके नहीं बनाया जा सकता। राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित नहीं हो सकता। यह केवल असहिष्णुता, घृणा और हिंसा को जन्म देगा। उन दिनों आरएसएस और हिंदू महासभा के कट्टरपंथी नेता गांधी को मुस्लिम परस्त साबित करने की नाकाम कोशिश करते रहते थे। गांधी 07 मई 1919 को “यंग इंडिया” में लिखते हैं, “मैं खुद को एक रूढ़िवादी हिंदू मानता हूं और मेरा दृढ़ विश्वास है कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म का ईमानदारी से पालन करता है, वह गाय की रक्षा के लिए एक गाय हत्यारे को पसंद नहीं करेगा।”
गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों के उपर हमले पर उन्होंने 18 मई 1921 को “यंग इंडिया” में लिखा, “हिंसा द्वारा गोरक्षा का प्रयास करना हिंदू धर्म को शैतानी बनाना है और गोरक्षा के महान महत्व को नीचा दिखाना है।”
सभी सांप्रदायिक ताकतें,चाहे वो मुस्लिम हों या हिन्दू, गांधी से नफरत करती थीं। गांधी की मौत पर मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने शोक संदेश में कहा,”वो हिंदू समुदाय के महात्मा लोगों में से एक थे।” जिन्ना का शोक संदेश में ये लिखना उनके मानसिक दिवालियापन को ही दर्शाता है।ये गांधी ही थे जिनके एक आह्वान पर “जमीयत-उलेमा-ए-हिंद” जो भारत के मुस्लिम धर्मशास्त्रियों का एक प्रबुद्ध संगठन था, आजादी के आंदोलन में शामिल हो गया था।इस संगठन ने देश विभाजन का कडा विरोध किया था और जनता से जिन्ना के बहकावे में न आने की अपील की थी।
गांधी शरीर से भले ही चले गए हों मगर उनके विचार जब तक देश है, तब तक हमेशा याद रखे जायेंगे। महात्मा गांधी के पुण्य तिथि पर उन्हें सादर नमन…

अजय श्रीवास्तव
लेखक उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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