सीबीआई की एक विशेष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश निर्मल यादव को 2008 के भ्रष्टाचार के एक मामले में बरी कर दिया है।
चंडीगढ़ में स्थित इस अदालत ने शनिवार को अपना फैसला सुनाया। जस्टिस निर्मल यादव पर 17 साल पहले सीबीआई ने मामला दर्ज किया था। बरी होने के बाद न्यायमूर्ति यादव ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था। यह मामला 15 लाख रुपये की नकदी से भरे एक पैकेट के इर्द-गिर्द घूमता है, जो अगस्त 2008 में गलती से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की एक अन्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति निर्मलजीत कौर के घर पहुंचा दिया गया था। जस्टिस कौर ने तुरंत इस गड़बड़ी की सूचना उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और चंडीगढ़ पुलिस को दी थी। इसके बाद 16 अगस्त 2008 को एफआईआर दर्ज की गई थी।
सीबीआई को सौंपी गई जांच
मामले ने नया मोड़ तब लिया जब केंद्र शासित प्रदेश के तत्कालीन प्रशासक जनरल एसएफ रोड्रिग्स (सेवानिवृत्त) ने इसे सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया। सीबीआई ने 28 अगस्त 2008 को नई प्राथमिकी दर्ज की। जांच में पता चला कि नकदी हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव बंसल के एक क्लर्क द्वारा गलती से जस्टिस कौर के घर पहुंचाई गई थी।
मुकदमा चलाने की मंजूरी और सुनवाई
सीबीआई ने जनवरी 2009 में जस्टिस यादव पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी, जिसे नवंबर 2010 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मंजूरी दी। मार्च 2011 में राष्ट्रपति कार्यालय ने अभियोजन स्वीकृति दी, जिसके बाद सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल किया। पूरे मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 84 गवाहों को सूचीबद्ध किया, जिनमें से 69 की जांच की गई
न्यायालय का निर्णय
विशेष सीबीआई न्यायाधीश अलका मलिक ने शनिवार को अपने आदेश में न्यायमूर्ति निर्मल यादव को सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायालय ने यह माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया। बरी होने के बाद जस्टिस यादव ने कहा कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है और उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास था।





