शांति निकेतन

यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के रूप में शांतिनिकेतन को मान्यता दी

“तेरा आह्वान सुनकर कोई ना आए, तो तू चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला” – रवींद्रनाथ टैगोर

रविंद्र नाथ टैगोर की यह कविता, युवाओं में एक नया जोश भरती हैं उनमें साहस और आत्मविश्वास भरती है। कई सालों के बाद अब ऐसा लग रहा है कि मानो रविंद्र नाथ टैगोर की सभी मेहनत उनकी कविताएं, कहानियां, उनके गाने आज अमर हो चुके हैं। क्योंकि पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में स्थित शांति निकेतन जिसे रविंद्र नाथ टैगोर के घर के नाम से भी जाना जाता है, वह यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल हो चुका है। हालांकि वर्ष 2010 से ही शांति निकेतन को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दिलाने के प्रयास चल रहे थे, लेकिन अंत में सफ़लता 17 सितम्बर 2023 को मिली, और शांतिनिकेतन को यूनेस्को द्वारा भारत के 41 में विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गई।

शांति निकेतन की लोकप्रियता का कारण
यदि हम ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 1862 में रविंद्र नाथ टैगोर के पिता देवेंद्र नाथ टैगोर ने इसके प्राकृतिक परिदृश्य को देखा और शांति निकेतन नामक एक आश्रम स्थापित करने का निर्णय लिया। जिसका अर्थ है शांति का निवास। यह क्षेत्र जिसे मूल रूप से भूबडंगा कहा जाता है, ज्ञान के लिए एक अनुकूल वातावरण है और इस कारण देवेंद्र नाथ टैगोर ने इस स्थान का नाम शांति निकेतन रखा था। वर्ष 1901 में रविंद्र नाथ टैगोर ने भूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चुना, और ब्रह्मचर्य आश्रम मॉडल के आधार पर एक विद्यालय की स्थापना की। यही विद्यालय आगे चलकर विश्व भारती विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। इस स्थान की प्रमुखता और ऐतिहासिक महत्त्व को देखते हुए, संस्कृति मंत्रालय ने मानवीय मूल्य, वास्तुकला, नगर नियोजन, और परिदृश्य डिजाइन में इसके महत्व पर बल देते हुए शांतिनिकेतन को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने का प्रस्ताव दिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण शांति निकेतन के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए कई संरचनाओं के जुड़ने उधर में शामिल रहे।

कौन थें रवींद्र नाथ टैगोर
रवींद्रनाथ टैगोर एक कवि, साहित्यकार, दार्शनिक, नाटककार, संगीतकार और चित्रकार थे इन्हें गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर या गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। विश्व विख्यात महाकाव्य गीतांजलि की रचना इन्होंने ही की थी, इसके लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा साहित्य के क्षेत्र में नोबेल जीतने वाले यह अकेले भारतीय हैं। रविंद्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1961 में कोलकाता के एक प्रमुख बंगाली परिवार में हुआ था। यह अपने पिता के 13 बच्चों में सबसे छोटे और लोकप्रिय भी थे। उन्होंने स्कूली शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल में पूरी की और फिर बैरिस्टर बनने के सपने के साथ 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजस्टोन में एक पब्लिक स्कूल में दाखिला लिया। और उन्हें लंदन विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की, लेकिन 1880 में बिना डिग्री लिए ही भारत लौट आए। रविंद्र नाथ टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से ऊंचे स्थान पर रखते थे। गुरुदेव ने कहा था जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देश भक्ति की जीत नहीं होने दूंगा। टैगोर गांधी जी का बहुत सम्मान करते थे, लेकिन वह उनसे राष्ट्रीयता देशभक्ति सांस्कृतिक विचारों की अदला-बदली तर्क शक्ति जैसे विषयों पर अलग राय रखते थे। हर विषय में टैगोर का दृष्टिकोण परंपरावादी कम और तर्कसंगत ज्यादा हुआ करता था।
वर्ष 1915 में रविंद्र नाथ टैगोर को ब्रिटिश किंग जॉर्ज पंचम के द्वारा नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया गया था और फिर 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के पास उन्होंने नाइटहुड की उपाधि का त्याग भी कर दिया। रविंद्र नाथ टैगोर ने दो देशों के लिए राष्ट्रगान लिखे, जन गण मन और अमर सोनार बांग्ला। जन गण मन भारत का राष्ट्रगान बना तो अमर सोनार बांग्ला बांग्लादेश का राष्ट्रगान। यदि उनके साहित्यिक कार्यों पर नजर डालें तो उनकी साहित्यिक कृतियों में कविताएं लघु कथाएं उपन्यास निबंध और नाटक शामिल है। उनके कुछ उल्लेखनीय कार्यों में द होम एंड द वर्ल्ड, गोरा, गीतांजलि, मानसी, बालिका, सोनार तोरी, और काबुलीवाला शामिल है। रविंद्र नाथ टैगोर एक बहुत अच्छे संगीतकार भी थे, जितनी मधुर उनकी आवाज़ थी उतना ही अच्छा वे लिखते भी थे। रविंद्र नाथ टैगोर को उनके गाने एकला चलो रे के लिए भी याद किया जाता है।
रविंद्र नाथ टैगोर केवल साहित्यिक क्षेत्र में ही रुझान नहीं रखते थे बल्कि वह एक सामाजिक सुधार, एकता, सद्भाव, शालीनता के विचारों को बढ़ावा भी देते थे उसके बहुत बड़े समर्थक थे। उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की आलोचना की तथा भारतीय स्वतंत्रता के लिए कार्य किया। उन्होंने मानवतावाद धार्मिकता और प्रकृति तथा मानवता के बीच संबंध के महत्व पर जोर दिया। टैगोर की लेखनी शैली को उनके गीतात्मक और दार्शनिक गानो द्वारा चिन्हित किया गया जो अक्सर प्रेम प्रकृति और आध्यात्मिकता के विषयों की खोज करती थी। 7 अगस्त 1941 को साहित्य की समृद्ध विरासत और भारतीय एवं विश्व संस्कृति पर स्थाई प्रभाव छोड़ते हुए रविंद्र नाथ टैगोर का निधन हो गया।

विश्व धरोहर क्या होते हैं?
यूनेस्को के अनुसार विश्व विरासत स्थल ऐसे खास स्थान वन, पर्वत, झील, मरुस्थल, स्मारक, भवन या शहर आदि को कहा जाता है जो विश्व विरासत स्थल समिति द्वारा चयनित होते हैं। यह समिति इन स्थानों की देखरेख करती है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विश्व के ऐसे स्थानों को चयनित एवं संरक्षित करना होता है, जो विश्व संस्कृति की दृष्टि से मानवता के लिए महत्वपूर्ण है। कुछ खास परिस्थितियों में ऐसे स्थलों को स्थल समिति द्वारा आर्थिक सहायता भी दी जाती है। प्रत्येक विरासत स्थल उसे देश विशेष की संपत्ति होती है जिस देश में वह स्थल स्थित हो, परंतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय का हि त इसी में होता है कि वह आने वाली पीढियों के लिए और मानवता के लिए इसका संरक्षण करें। विश्व धरोहर को यूनेस्को की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। किसी भी देश को पहले चरण में किसी स्थल की अस्थाई सूची तैयार करना होता है उसके बाद नॉमिनेशन फाइल बनाकर उस पर विचार किया जाता है कि क्या सच में चयनित स्थल विश्व धरोहर सूची के यूनेस्को साइट में शामिल होने के लिए सही है या नहीं। वर्तमान भारत में 41 यूनेस्को विश्व विरासत स्थल है जिनमें साथ प्राकृतिक 33 सांस्कृतिक और एक मिश्रित स्थल है जिसमें शांतिनिकेतन भी शामिल हो चुका है।
विरासत स्थल सूची में शामिल किए जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि खुशी है कि गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की दृष्टिकोण और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक शांति निकेतन को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है यह सच में सभी भारतीयों के लिए गर्व का क्षण है। तो वहीं केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा प्रधानमंत्री विश्व भारती के कुलाधिपति हैं और यह उनके गतिशील नेतृत्व में है की संस्कृति मंत्रालय हमारे स्मारकों की वैश्विक मान्यता के लिए प्रतिबद्ध है और साइट जो हमारे समृद्धि इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं।
शांतिनिकेतन के अलावा 17 सितंबर 2023 को प्रतिष्ठित सूची में जगह पाने वाले अन्य जगह में फिलिस्तीन प्राचीन जेरी को कजाकिस्तान तुर्कमेनिस्तान उज्बेकिस्तान में सिल्क रोड का जरफशान काराकुम कॉरिडोर, इथियोपिया में गेडियो सांस्कृतिक परिदृश्य, और चीन के पूअर में जिग्मई पर्वतों के पुराने जंगलों का संस्कृतिक परिदृष्य शामिल हैं।

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