सिंधु जल संधि पर भारत द्वारा रोक लगाए जाने के बाद पाकिस्तान की स्थिति बेहद असहज हो गई है। अब पाकिस्तान इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) और विश्व बैंक के सामने ले जाने की योजना बना रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यहां भी पाकिस्तान को निराशा ही हाथ लगेगी। आइए जानते हैं कि पाकिस्तान इस विवाद को लेकर क्या रणनीति अपना रहा है और क्यों अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके प्रयास सफल होते नहीं दिख रहे हैं।
भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान का रुख
पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला लिया। इससे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है, क्योंकि वह पहले से ही जल संकट का सामना कर रहा है। भारत के इस कदम से पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। इस संकट से निकलने के लिए पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, स्थायी मध्यस्थता न्यायालय और विश्व बैंक के दरवाज़े खटखटाने की तैयारी कर रहा है। पाकिस्तान के कानून और न्याय राज्य मंत्री अकील मलिक के अनुसार, सरकार तीन कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। कानूनी सलाहकारों से विमर्श लगभग पूरा हो चुका है और जल्द ही इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। मलिक ने यह भी कहा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी यह मुद्दा उठाने की तैयारी कर रहा है। उनका आरोप है कि भारत ने संधि को एकतरफा तरीके से रोका है, जो कि संधि प्रावधानों के खिलाफ है।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की सीमाएं
हालांकि पाकिस्तान आईसीजे में मामला ले जाना चाहता है, परंतु यह इतना सरल नहीं है। आईसीजे केवल उन्हीं मामलों पर सुनवाई करता है, जिनमें दोनों देश उसकी क्षेत्राधिकार को मानते हैं। भारत ने 27 सितंबर 2019 को एक घोषणापत्र के माध्यम से स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्रमंडल देशों के साथ किसी विवाद पर आईसीजे का अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होगा। पाकिस्तान, राष्ट्रमंडल का सदस्य देश होने के कारण, भारत को न्यायालय में नहीं घसीट सकता। इसके अलावा, घोषणापत्र में कहा गया था कि युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा, सशस्त्र संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों से जुड़े मामलों में आईसीजे का क्षेत्राधिकार नहीं होगा। ऐसे में पाकिस्तान की आईसीजे में अपील की कोशिशें कानूनी तौर पर कमजोर हैं।
विश्व बैंक की भूमिका सीमित
विश्व बैंक की भूमिका भी इस मामले में काफी सीमित है। 1960 में सिंधु जल संधि के समय वह एक मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रहा था, लेकिन वह संधि का प्रवर्तक नहीं है। आज भी विश्व बैंक केवल तटस्थ सलाहकार के रूप में काम कर सकता है, और उसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं। वह दोनों पक्षों को संवाद के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, लेकिन वह न तो संधि को लागू कर सकता है और न ही उसकी व्याख्या करने का अधिकार रखता है। इस कारण पाकिस्तान की ओर से विश्व बैंक पर भरोसा करना भी व्यावहारिक समाधान नहीं माना जा सकता। माना जा रहा है कि विश्व बैंक की किसी भी गैर-बाध्यकारी सलाह को भारत अस्वीकार कर सकता है।





