दिल्ली में उफान मारती यमुना का पानी कई इलाकों में घुस चुका है। इससे वाहन डूब गए हैं और इमारतें जलमग्न हो गई हैं। हजारों लोग बेघर हो गए हैं। यमुना का जलस्तर 207.47 मीटर तक पहुँच गया है और इसके 208 मीटर तक जाने की संभावना जताई गई है। फिलहाल पानी के जल्द उतरने के आसार नहीं हैं। लगातार बढ़ते जलस्तर ने राजधानी के कई हिस्सों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। शहर के भीतर भी पानी भरने का खतरा बढ़ गया है। हथिनीकुंड बैराज से छोड़े जा रहे पानी को देखते हुए साफ है कि हालात जल्द काबू में नहीं आएंगे। देर रात जलस्तर 207.40 मीटर दर्ज किया गया। केंद्रीय जल आयोग ने चेतावनी दी है कि पानी और बढ़ सकता है। अगर स्तर 208 मीटर तक पहुँचता है तो आउटर रिंग रोड और कश्मीरी गेट आईएसबीटी तक पानी फैलने की आशंका है, जिससे यातायात और जनजीवन दोनों बुरी तरह प्रभावित होंगे। लगातार बारिश और यमुना में बढ़ते पानी के कारण मयूर विहार-फेज 1 के पास बने राहत शिविरों तक में पानी घुस गया है। सिविल लाइंस स्थित बेला रोड पर भी पानी भरने से वाहन डूब गए और इमारतें जलमग्न हो गईं। निचले इलाकों में रहने वालों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा चुका है। लोहा पुल और आसपास के क्षेत्रों में हालात गंभीर बने हुए हैं।
निगमबोध घाट डूबा, अंतिम संस्कार रुके
बढ़ते जलस्तर का असर निगमबोध घाट पर भी पड़ा है। बुधवार शाम तक यहाँ पूरा इलाका बाढ़ की चपेट में आ गया, जिससे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया रोक दी गई। परिसर में कई फीट पानी भर गया है और यमुना का प्रवाह रिंग रोड तक पहुँच चुका है। मिट्टी और बोरे डालकर पानी रोकने की कोशिश नाकाम रही। दीवार का कुछ हिस्सा टूट जाने से हालात और बिगड़ गए। बाढ़ नियंत्रण विभाग व एमसीडी की टीमें हालात पर नज़र रखे हुए हैं।
हिंदू शरणार्थियों पर संकट
वजीराबाद इलाके में पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के लिए स्थिति और भी मुश्किल हो गई है। उनके घरों में पानी भर गया है, जिससे उन्हें सिग्नेचर ब्रिज के पास शरण लेनी पड़ रही है। आरोप है कि प्रशासन ने कोई टेंट या आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई हैं। भारी बारिश से उनकी परेशानी बढ़ गई है और लोग खुले आसमान के नीचे ठंड व कीचड़ में रहने को मजबूर हैं। शरणार्थियों का कहना है कि रातभर घर व सामान को बचाने के लिए जागना पड़ता है। बच्चों की तबीयत बिगड़ रही है और भोजन-पानी की भारी कमी है। उनका दर्द यह है कि पाकिस्तान से शरण लेने आए थे, लेकिन अब यहाँ भी विस्थापित होकर बिना टेंट और बुनियादी सुविधाओं के गुजर-बसर करनी पड़ रही है।





