राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे कांग्रेस के लिए किसी संकटमोचक से कम नहीं हैं।
बिहार में महागठबंधन की एकता पर उठ रहे सवालों के बीच गहलोत ने अपनी राजनीतिक समझ और कूटनीति से 24 घंटे से भी कम समय में हालात संभाल लिए। उनकी सादगी और मृदुभाषी स्वभाव के पीछे छिपा गहरा रणनीतिक मस्तिष्क उन्हें उन नेताओं में शामिल करता है, जो राजनीतिक संकटों को सुलझाने में माहिर हैं। बिहार में महागठबंधन के बीच तनाव कम करने और एकजुटता का संदेश देने में उनकी भूमिका ने एक बार फिर उनकी राजनीतिक सूझबूझ को उजागर किया है। हाल के दिनों में बिहार में महागठबंधन की एकता पर संदेह जताया जा रहा था। राजद, कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के बीच मतभेदों की खबरें सामने आ रही थीं। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व ने यह जिम्मेदारी अशोक गहलोत को सौंपी। बिहार पहुंचते ही गहलोत ने सभी प्रमुख नेताओं से मुलाकात की और मतभेद दूर करने का प्रयास किया। उनकी मध्यस्थता का परिणाम यह हुआ कि सभी दलों ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एकजुट होकर आगामी चुनाव लड़ने का संकल्प जताया। गहलोत ने न केवल नेताओं को एक मंच पर लाया, बल्कि मीडिया के सामने भी एकता का सशक्त संदेश दिया।
राजनीति के माहिर रणनीतिकार
अशोक गहलोत का राजनीतिक सफर पांच दशक से अधिक का रहा है, जिसमें उन्होंने कई बार अपनी कूटनीतिक क्षमता का परिचय दिया। 2017 में गुजरात में अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग का संकट आने पर गहलोत ने रातोंरात सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिससे कांग्रेस को बड़ी राहत मिली। 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उन्होंने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति अपनाई और एक खास वोट बैंक को साधने की कोशिश की। हालांकि परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे, पर उनकी रणनीति ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी।
हरियाणा और महाराष्ट्र में भी दिखी कुशलता
2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में कुमारी शैलजा और भूपेंद्र हुड्डा के बीच मतभेदों के समय गहलोत को पर्यवेक्षक बनाया गया। उन्होंने दोनों नेताओं के बीच तालमेल बैठाने में अहम भूमिका निभाई। इसी तरह, महाराष्ट्र में भी सचिन पायलट के साथ मिलकर उन्होंने संगठनात्मक एकता बनाए रखने में योगदान दिया।
राजस्थान की राजनीति में गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। 2022 में जब कांग्रेस हाईकमान नेतृत्व परिवर्तन पर विचार कर रहा था, तब गहलोत समर्थक विधायकों ने सामूहिक इस्तीफे की धमकी देकर स्थिति पलट दी। यह कदम भले ही पार्टी नेतृत्व को अप्रसन्न कर गया हो, लेकिन गहलोत ने अपनी राजनीतिक पकड़ का परिचय दे दिया। गहलोत की सबसे बड़ी ताकत उनके पुराने और गहरे राजनीतिक रिश्ते हैं। लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं से उनके दशकों पुराने संबंध आज भी असरदार हैं। उनका विनम्र स्वभाव और मुस्कराहट लोगों को सहज ही अपने पक्ष में कर लेती है। यही कारण है कि बिहार संकट के समाधान के लिए पार्टी ने उन्हें चुना, और उन्होंने यह जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई।
अशोक गहलोत की सबसे बड़ी विशेषता है उनका संयम और रणनीतिक सोच। चाहे अपनी सरकार बचाने का मामला हो या किसी राजनीतिक गठबंधन को एकजुट रखने का, वे हमेशा सोच-समझकर कदम उठाते हैं। बिहार में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि गहलोत कांग्रेस के भरोसेमंद संकटमोचक हैं, जो हर मुश्किल घड़ी में पार्टी के लिए समाधान लेकर आते हैं।





