‘आजादी की लड़ाई में ‘वंदे मातरम्’ की भावना ने पूरे राष्ट्र को आलोकित किया, ‘वंदे मातरम्’ केवल शब्द नहीं, यह एक मंत्र है, एक ऊर्जा है, एक स्वप्न है और एक संकल्प है। यह मां भारती की साधना भी है और आराधना भी… प्रधानमंत्री

राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक वर्ष तक चलने वाले स्मरणोत्सव का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल शब्द नहीं, यह एक मंत्र है, एक ऊर्जा है, एक स्वप्न है और एक संकल्प है। यह मां भारती की साधना भी है और आराधना भी। ‘वंदे मातरम्’ हमें हमारे गौरवशाली इतिहास से जोड़ता है, वर्तमान को आत्मविश्वास से भरता है और भविष्य के लिए प्रेरणा देता है कि कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी के दौर में ‘वंदे मातरम्’ आजादी का उद्घोष बन गया था। यह संकल्प था, भारत की स्वतंत्रता का। अंग्रेज जब भारत को पिछड़ा और कमजोर बताकर अपने शासन को उचित ठहराते थे, तब ‘वंदे मातरम्’ की पहली पंक्ति ने उनके झूठ को पूरी तरह नकार दिया। यही कारण है कि यह गीत सिर्फ स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं बना, बल्कि इसने करोड़ों भारतीयों के सामने एक स्वप्न रखा, ‘सुजलाम सुफलाम’ भारत का।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने 1927 में कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ हमारे सामने एक अखंड भारत की छवि प्रस्तुत करता है। समय के साथ हमारे राष्ट्रीय ध्वज में कई परिवर्तन हुए, लेकिन जब भी तिरंगा फहराया जाता है, तो ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ स्वतः ही जन-जन के मुख से निकलता है।’
प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि दुनिया ने नए भारत का यही रूप देखा है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अग्रणी है, पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और जब आतंकवाद ने हमारे सम्मान व सुरक्षा पर वार करने की कोशिश की, तब दुनिया ने देखा कि भारत अगर मानवता की सेवा में ‘कमला’ और ‘विमला’ है, तो आतंक के विनाश के लिए ‘दुर्गा’ भी बनना जानता है।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’ की भावना ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया, लेकिन 1937 में इसे खंडित कर दिया गया। इसकी आत्मा को बांटने का जो अन्याय हुआ, उसी ने आगे चलकर देश के विभाजन के बीज बोए। आज की पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि यह विभाजनकारी सोच आज भी देश के सामने चुनौती बनी हुई है।’




