कांग्रेस से गठबंधन कर नगर परिषद चुनाव में भाजपा ने सत्ता हासिल की
अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के गठबंधन ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को सत्ता से बाहर कर दिया है। भाजपा के इस कदम के महाराष्ट्र की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही, इस फैसले के बाद शिवसेना और भाजपा के बीच तनातनी बढ़ने की अटकलें भी तेज हो गई हैं। कहा जाता है कि राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी। महाराष्ट्र में भाजपा और कांग्रेस ने इस कहावत को सच साबित कर दिया है। अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव में दोनों दलों ने हाथ मिलाकर सियासी हलचल पैदा कर दी। कांग्रेस के समर्थन से भाजपा ने नगर परिषद की सत्ता अपने नाम कर ली। इस अप्रत्याशित गठबंधन ने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को अंबरनाथ में हाशिये पर ला खड़ा किया है। हैरानी की बात यह है कि शिवसेना को सत्ता से दूर रखने के लिए भाजपा ने कांग्रेस का साथ लिया। भाजपा के इस फैसले से शिंदे गुट की शिवसेना में नाराजगी साफ नजर आ रही है। शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसद श्रीकांत शिंदे ने कहा कि यदि अंबरनाथ में भाजपा और कांग्रेस का गठबंधन हुआ है, तो इसका जवाब भाजपा नेताओं को देना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय शिवसेना का नहीं है और न ही पार्टी को इस पर कोई सफाई देने की जरूरत है।
अंबरनाथ में कैसे बदला सियासी समीकरण?
अंबरनाथ के निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस का यह तालमेल इसलिए भी चौंकाता है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करती रही है। इस गठबंधन के चलते भाजपा की तेजश्री करंजुले महापौर चुनी गईं। गठबंधन को कुल 32 पार्षदों का समर्थन मिला, जिनमें भाजपा के 16, कांग्रेस के 12 और एनसीपी (अजित पवार गुट) के चार पार्षद शामिल थे। महाराष्ट्र में महायुति सरकार में भाजपा, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी शामिल हैं। इसके बावजूद नगर निकाय चुनावों में गठबंधन होने के बाद भी अंबरनाथ में शिवसेना को सत्ता से बाहर रहना पड़ा। शिंदे गुट के विधायक बालाजी किनिकर ने इस गठबंधन को “अपवित्र” बताते हुए भाजपा पर विश्वासघात का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जो पार्टी कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करती थी, वही आज कांग्रेस के साथ सत्ता में बैठी है। यह शिवसेना के साथ किया गया खुला धोखा है।






