एसआईआर ड्राफ्ट में भाजपा का शहरी गढ़ कमजोर पड़ने के संकेत

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) ने मतदाता सूची में भारी परिवर्तन ला दिया है। दो करोड़ 89 लाख नाम कटने से राजनीतिक दलों में हलचल मच गई है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां एक दल अपनी मजबूती का दावा करता रहा है। इस अभियान की शुरुआत चार नवंबर को हुई और यह 26 दिसंबर तक चली, जिसमें मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित तथा डुप्लीकेट नामों को हटाया गया। राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या 15 करोड़ 44 लाख से घटकर 12 करोड़ 55 लाख रह गई। लखनऊ जैसे शहरी क्षेत्रों में 30 प्रतिशत से अधिक नाम कटे, जहां पहले 39 लाख 90 हजार मतदाता थे, अब 27 लाख 90 हजार बचे। गाजियाबाद में 8 लाख 18 हजार नाम हटे, जो 29 प्रतिशत है। प्रयागराज में 11 लाख 56 हजार, कानपुर में नौ लाख तथा आगरा में 8 लाख 36 हजार नाम कटे। ये आंकड़े बताते हैं कि शहरी इलाकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा, जहां प्रवासी मजदूर तथा मध्यम वर्ग के लोग गांवों की ओर स्थानांतरित दिखे।
भाजपा को इन क्षेत्रों में अपनी मजबूती का भरोसा था, लेकिन नाम कटने से चिंता बढ़ गई। लखनऊ तथा गाजियाबाद जैसे संसदीय क्षेत्र उसके गढ़ माने जाते हैं, जहां शहरी वोट बैंक मजबूत था। विपक्ष के अनुसार, कटे नामों में भाजपा समर्थक 80 से 90 प्रतिशत हैं, जिससे पार्टी को नुकसान हो रहा। मुख्यमंत्री से लेकर संगठन स्तर तक बैठकों का दौर चल रहा है। योगी आदित्यनाथ ने विधायकों तथा सांसदों के साथ वर्चुअल बैठकें कीं तथा कार्यकर्ताओं को शादियों जैसे कार्यक्रम स्थगित कर अभियान पर ध्यान देने को कहा। संगठन तथा संघ की समन्वय बैठक में भी लापरवाही पर चिंता जताई गई। भाजपा कार्यकर्ता मतदाताओं से संपर्क में निष्क्रिय रहे, जिससे फॉर्म भरवाने तथा समस्याएं सुनने का काम कमजोर पड़ा।
समाजवादी पार्टी ने इस दौरान सक्रियता दिखाई। पार्टी ने जगह-जगह कैम्प लगाए तथा अपने मतदाताओं के फॉर्म भरवाए। कानपुर तथा अमेठी जैसे स्थानों पर बूथवार सत्यापन किया तथा ड्राफ्ट सूची की प्रतियां लीं। इससे उनके वोटरों के नाम कम कटे तथा जो कटे, उन्हें जोड़ने का प्रयास तेज है। सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम खान ने कहा कि भाजपा को भारी नुकसान होगा जबकि सपा का वोट जोड़ा जाएगा। विपक्षी दलों के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में सत्ता विरोधी लहर वाले इलाकों में कटौती ज्यादा हुई, जो सपा के ग्रामीण आधार को फायदा पहुंचाएगी।
उधर, बहुजन समाज पार्टी तथा कांग्रेस पर अभियान का असर मिश्रित दिख रहा है। बसपा के पारंपरिक दलित बहुल ग्रामीण क्षेत्रों में नाम कटौती कम रही, लेकिन शहरी सीटों जैसे आगरा तथा लखनऊ में 25 से 30 प्रतिशत कमी से उसके वोट शेयर पर दबाव पड़ सकता है। आगरा में 8 लाख नाम कटे, जहां बसपा मजबूत रही है। फिर भी, डुप्लीकेट तथा मृत नाम हटने से सूची शुद्ध होने से बसपा को लंबे समय में फायदा मिल सकता है, क्योंकि उसके कोर वोटर ग्रामीण हैं जहां कटौती 12 से 18 प्रतिशत रही। कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान शहरी अल्पसंख्यक तथा गरीब वोट से हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि दलित, गरीब तथा अल्पसंख्यक प्रभावित हुए तथा प्रक्रिया जल्दबाजी वाली थी। मुस्लिम बहुल जिलों में कटौती कम रही, लेकिन कुल 2.89 करोड़ में कांग्रेस समर्थक वोटरों की हिस्सेदारी से उसका वोट प्रतिशत घट सकता है। प्रमोद तिवारी ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया।
कुल मिलाकर, अभियान से भाजपा के शहरी गढ़ कमजोर हुए हैं। लखनऊ में 12 लाख कटौती से प्रति विधानसभा 60 से 80 हजार वोट कम हुए, जो 10 से 15 सीटें प्रभावित कर सकता है। सपा की सक्रियता से उसे ग्रामीण मजबूती मिली। बसपा को मामूली फायदा ग्रामीण आधार से, लेकिन शहरी नुकसान। कांग्रेस को सर्वाधिक हानि अल्पसंख्यक वोट से। अब छह फरवरी तक दावे आपत्तियां दर्ज होंगी, जिसमें दल सक्रिय हैं। यह प्रक्रिया आने वाले चुनावों का समीकरण बदल सकती है, क्योंकि शहरी वोट ग्रामीण की ओर खिसके।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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