नई दिल्ली। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को एक सप्ताह के भीतर दो बार बेहोशी की शिकायत के बाद सोमवार को दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की निगरानी में उनका एमआरआई सहित अन्य जरूरी चिकित्सकीय परीक्षण किए जा रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, 10 जनवरी को जगदीप धनखड़ को वॉशरूम में अचानक चक्कर आने के बाद दो बार बेहोशी का दौरा पड़ा था। इसके बाद वह सोमवार को नियमित स्वास्थ्य जांच के लिए एम्स पहुंचे थे, लेकिन उनकी स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी। सूत्रों ने बताया कि यह पहली बार नहीं है जब पूर्व उपराष्ट्रपति को इस तरह की स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ा हो। उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी वह कच्छ, उत्तराखंड, केरल और दिल्ली समेत कई स्थानों पर सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान अचानक अस्वस्थ होकर बेहोश हो चुके हैं।
स्वास्थ्य कारणों से छोड़ा था उपराष्ट्रपति पद
गौरतलब है कि पिछले वर्ष 21 जुलाई को जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे अपने पत्र में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के तहत पद छोड़ने की जानकारी दी थी। उन्होंने लिखा था कि स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और चिकित्सकों की सलाह का पालन करने के उद्देश्य से वह यह निर्णय ले रहे हैं। उनके इस्तीफे के बाद हुए चुनाव में सी.पी. राधाकृष्णन को भारत का नया उपराष्ट्रपति चुना गया।
कानून से राजनीति तक का सफर
राजस्थान निवासी जगदीप धनखड़ किसान परिवार से आते हैं और जाट समुदाय से संबंध रखते हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक वकील के रूप में की। 1979 में राजस्थान बार काउंसिल में नामांकन के बाद उन्होंने 1990 में राजस्थान उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में पहचान बनाई। संवैधानिक कानून में विशेषज्ञता के कारण उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी एक प्रभावशाली अधिवक्ता के रूप में काम किया। राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने 1989 में झुंझुनू से लोकसभा सांसद बनकर की। 1990 में चंद्रशेखर सरकार में वह संसदीय कार्य राज्य मंत्री रहे। इसके बाद 1993 से 1998 तक वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य भी रहे।
संवैधानिक पदों पर मजबूत उपस्थिति
2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और 2022 में भारत के उपराष्ट्रपति बनने तक जगदीप धनखड़ ने विभिन्न संवैधानिक पदों पर रहते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया, संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया और आयुर्वेद सहित भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के समर्थन में भी पहल की।




