डब्लूएचओ से बाहर हुआ अमेरिका: एजेंसी बोली- 133 मिलियन डॉलर बकाया

डब्लूएचओ से अमेरिका का अलगाव: वैश्विक स्वास्थ्य और फार्मा सेक्टर पर गहराता संकट

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) से अमेरिका के औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया पर अब अंतिम मुहर लग गई है। 133 मिलियन डॉलर के बकाया भुगतान, डेटा शेयरिंग व्यवस्था के खत्म होने और रणनीतिक मतभेदों के बीच लिया गया यह फैसला न केवल अमेरिकी फार्मास्युटिकल उद्योग, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर परिणाम ला सकता है। जानिए इस बड़े फैसले के पीछे की वजहें और इसके संभावित असर।
वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति और अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक अहम मोड़ पर पहुंचते हुए अमेरिका ने गुरुवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन से अपने रिश्ते पूरी तरह समाप्त कर लिए। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 78 वर्षों पुरानी इस साझेदारी को खत्म करने की घोषणा के ठीक एक साल बाद अब यह निर्णय औपचारिक रूप से लागू हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी फार्मा सेक्टर और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे के लिए कई आर्थिक और रणनीतिक सवाल खड़े करता है।

वित्तीय विवाद बना अलगाव की बड़ी वजह
अमेरिका और डब्लूएचओ के बीच दूरी की सबसे बड़ी वजह एक बड़ा वित्तीय विवाद रहा है। जिनेवा स्थित इस वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक, अमेरिका पर 130 मिलियन डॉलर (करीब 1,080 करोड़ रुपये) से अधिक का बकाया है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, अमेरिका ने 2024 और 2025 के लिए अपना सदस्यता शुल्क जमा नहीं किया, जिससे कुल देनदारी बढ़कर 133 मिलियन डॉलर से ज्यादा हो गई।
अमेरिका डब्लूएचओ का सबसे बड़ा वित्तीय सहयोगी रहा है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका हर साल औसतन 11.1 करोड़ डॉलर सदस्यता शुल्क और करीब 57 करोड़ डॉलर स्वैच्छिक योगदान के तौर पर देता रहा है। संगठन के नियमों के मुताबिक, सदस्यता छोड़ने से पहले एक साल का नोटिस और सभी वित्तीय दायित्वों का निर्वहन जरूरी होता है। हालांकि ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अमेरिका पर संगठन से बाहर होने से पहले भुगतान करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं बनता।

फार्मा और रिसर्च सेक्टर पर गहराने का खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले का सबसे बड़ा असर अमेरिका के विशाल फार्मास्युटिकल उद्योग और अनुसंधान एवं विकास (R&D) तंत्र पर पड़ सकता है। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ लॉ विशेषज्ञ लॉरेंस गोस्टिन का कहना है कि डब्लूएचओ से दूरी अमेरिकी वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों की नई बीमारियों के खिलाफ टीके और दवाएं विकसित करने की क्षमता को कमजोर कर सकती है।
अमेरिका ने पहले ही डब्लूएचओ की उन समितियों और तकनीकी समूहों में भागीदारी बंद कर दी है, जो फ्लू के नए स्ट्रेन की पहचान और वैक्सीन अपडेट से जुड़े फैसले लेते हैं। गोस्टिन के मुताबिक, इस तरह की ‘डिजीज इंटेलिजेंस’ से कटने के बाद, भविष्य में किसी नई महामारी के दौरान अमेरिकी दवा कंपनियां और नागरिक टीकों व दवाओं तक प्राथमिक पहुंच का अपना रणनीतिक लाभ खो सकते हैं।

डेटा शेयरिंग को लेकर ट्रंप प्रशासन का तर्क
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वह डब्लूएचओ को मध्यस्थ बनाए बिना देशों के साथ सीधे स्वास्थ्य डेटा साझा करने की व्यवस्था अपनाएगा। हालांकि, विशेषज्ञ इस रणनीति को व्यावहारिक नहीं मानते। लॉरेंस गोस्टिन ने सवाल उठाया कि क्या चीन जैसे देश, जहां कई वायरस पहली बार सामने आते हैं, या वे राष्ट्र जिन पर अमेरिका ने भारी टैरिफ लगाए हैं, सीधे डेटा साझा करने के लिए तैयार होंगे? उन्होंने इस दावे को अव्यावहारिक करार दिया। प्रशासन के अधिकारियों ने भी माना है कि अन्य देशों से डेटा तक पहुंच खोना अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, जिससे भविष्य की महामारियों की समय रहते चेतावनी मिलना मुश्किल होगा।

डब्लूएचओ से हटने के पीछे क्या हैं कारण
राष्ट्रपति ट्रंप ने पद संभालने के बाद जारी एक कार्यकारी आदेश में कोरोना महामारी के दौरान कथित कुप्रबंधन और आवश्यक सुधारों में विफलता को डब्लूएचओ से अलग होने की प्रमुख वजह बताया था। प्रशासन का यह भी आरोप है कि 1948 में संगठन की स्थापना के बाद से अब तक इसके नौ शीर्ष अधिकारियों में कोई भी अमेरिकी नहीं रहा, जबकि अमेरिका इसका सबसे बड़ा फंडर रहा है। इसके अलावा, महामारी के दौरान मास्क को लेकर भ्रमित सलाह और कोविड-19 के हवा से फैलने के मुद्दे पर देर से रुख बदलने जैसी बातों को भी फैसले का आधार बताया गया है।
इन्फेक्शियस डिजीज सोसाइटी ऑफ अमेरिका के अध्यक्ष डॉ. रोनाल्ड नहास ने इस कदम को अदूरदर्शी और वैज्ञानिक दृष्टि से लापरवाह बताया है। वहीं, लॉरेंस गोस्टिन ने इसे किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा लिया गया सबसे खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य निर्णय करार दिया है।

दूरगामी असर की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह फैसला केवल एक कूटनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि इसके व्यापक आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परिणाम सामने आ सकते हैं। एक ओर डब्लूएचओ की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ेगा, तो दूसरी ओर अमेरिकी फार्मा उद्योग वैश्विक स्वास्थ्य डेटा नेटवर्क से कट सकता है। अब यह देखना अहम होगा कि अमेरिका द्विपक्षीय समझौतों के जरिए इस खालीपन को भर पाता है या यह निर्णय वैश्विक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से भारी पड़ता है।

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