
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5, 2019-21) के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग में अधिकांश राज्यों में अंडा, मछली, चिकन या मांस खाने वालों की हिस्सेदारी काफी अधिक है। यह सर्वे स्पष्ट करता है कि नॉन-वेज भोजन भारतीय समाज की मुख्यधारा का हिस्सा है।
नॉन-वेज अब केवल खान-पान की पसंद नहीं रह गया है, बल्कि यह चुनावी बहस का भी एक अहम मुद्दा बन चुका है। बीते कई चुनावों में यह विषय सुर्खियों में रहा है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भी ‘मछली–मांस’ राजनीतिक मुद्दा बन सकता था, लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार के कदम से इस पर विराम लग गया है। हावड़ा–कामाख्या वंदे भारत ट्रेन में यात्रियों को अब नॉन-वेज भोजन का विकल्प उपलब्ध करा दिया गया है। इस ट्रेन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जनवरी को हरी झंडी दिखाई थी और यह 22 जनवरी से यात्रियों के लिए शुरू हुई। शुरुआत में इसके मेनू में नॉन-वेज विकल्प शामिल नहीं था, जिसे लेकर तृणमूल कांग्रेस ने आपत्ति जताई। इसके बाद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भरोसा दिलाया था कि हावड़ा–कामाख्या वंदे भारत में नॉन-वेज भोजन उपलब्ध कराया जाएगा। अब रेलवे ने संशोधित मेनू जारी कर इस फैसले को लागू कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस का तर्क था कि जिन दो क्षेत्रों को यह ट्रेन जोड़ती है, वहां के लोग पारंपरिक रूप से नॉन-वेज भोजन पसंद करते हैं, ऐसे में केवल शाकाहारी विकल्प देना भेदभावपूर्ण है। पार्टी ने इसे उसी सोच का विस्तार बताया, जिसके तहत मछली खाने वाले बंगालियों को ‘मुगल’ कहा जाता है।
रेलवे का कहना था कि यह ट्रेन मां कामाख्या और मां काली जैसे दो पवित्र धार्मिक स्थलों को जोड़ती है, इसलिए शुरुआत में नॉन-वेज भोजन को मेनू में शामिल नहीं किया गया था। नॉन-वेज भोजन को लेकर समय-समय पर सरकार की ओर से तरह-तरह की पाबंदियों के आदेश आते रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि देश में केवल तीन राज्यों को छोड़कर बाकी सभी में नॉन-वेज खाने वालों की संख्या बहुमत में है।
नॉन-वेज और चुनावी राजनीति
इससे पहले भी कई चुनावों में खान-पान, खासकर नॉन-वेज, को राजनीतिक मुद्दा बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में ‘मांस की राजनीति’ लंबे समय से चर्चा में रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने ‘अवैध बूचड़खानों’ को बंद करने का वादा किया था और सत्ता में आते ही बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई। हर साल नवरात्रों के दौरान पश्चिमी यूपी के कई जिलों में मीट की दुकानें बंद कराने की परंपरा भी देखी जाती रही है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव (मई 2023) से पहले ‘हलाल मांस’ के बहिष्कार का मुद्दा जोर पकड़ चुका था। चुनाव के दौरान दक्षिणपंथी संगठनों ने ‘झटका’ मांस को बढ़ावा देने की मांग की और हलाल सर्टिफिकेट को ‘आर्थिक जिहाद’ तक करार दिया गया।
हरियाणा में अगस्त 2021 के दौरान नगर निगम चुनावों और त्योहारों के समय कई शहरों में नौ दिनों तक मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया। गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा और राजकोट में 2021-22 के स्थानीय निकाय चुनावों से पहले सड़कों पर नॉन-वेज बेचने वाली रेहड़ियों के खिलाफ विशेष अभियान चलाए गए। इस पर गुजरात हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया था कि लोग क्या खाएंगे, यह तय करने का अधिकार नगर निगम को कैसे हो सकता है। अयोध्या में राम मंदिर के 15 किलोमीटर के दायरे में नॉन-वेज भोजन की डिलीवरी पर भी प्रतिबंध लगाया गया। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव द्वारा मछली खाते हुए तस्वीर साझा करने पर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ।
नॉन-वेज क्यों बनता है चुनावी मुद्दा?
आंकड़ों के विश्लेषण से इसके दो प्रमुख कारण सामने आते हैं। पहला, अधिकांश राज्यों में नॉन-वेज खाने वाले बहुसंख्यक हैं, हालांकि रोज़ाना नॉन-वेज खाने वालों की संख्या बहुत कम है। ऐसे में किसी खास मौके पर प्रतिबंध लगाने से धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ जाती है, जबकि आम लोगों को इससे बड़ी असुविधा भी नहीं होती। दूसरा कारण यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में नॉन-वेज खाने वालों की संख्या सबसे अधिक है। NFHS-5 के अनुसार, सबसे गरीब वर्ग में 83 प्रतिशत महिलाएं और 92 प्रतिशत पुरुष नॉन-वेज खाते हैं। यह तबका आमतौर पर ठोस नीतिगत वादों के बजाय भावनात्मक मुद्दों से अधिक आसानी से प्रभावित होता है।
गणतंत्र दिवस और नॉन-वेज विवाद
इस बार मामला धर्म से आगे बढ़कर ‘राष्ट्रीयता’ तक पहुंच गया। ओडिशा के कोरापुट जिले में गणतंत्र दिवस के अवसर पर नॉन-वेज पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसका व्यापक विरोध हुआ। बाद में जिला प्रशासन को आदेश वापस लेना पड़ा। कोरापुट आदिवासी बहुल जिला है, जहां नॉन-वेज भोजन परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है। जहां एक ओर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ जगहों पर इन्हें हटाने की मांग भी उठ रही है। महाराष्ट्र के वित्त व योजना विभाग के मंत्री आशीष जायसवाल ने हाल ही में वन विभाग से मांग की कि संरक्षित वनों, अभयारण्यों और टाइगर रिजर्व में बने रेस्ट हाउसों में नॉन-वेज भोजन परोसने की अनुमति दी जाए, ताकि पर्यटन और राजस्व को बढ़ावा मिल सके।
कुल मिलाकर, नॉन-वेज भोजन का मुद्दा अब केवल थाली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजनीति, संस्कृति और चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है।






