सिंगल मदर को पूर्ण अभिभावक मानना संवैधानिक निष्ठा: बॉम्बे हाईकोर्ट

रेप पीड़ित मां के पक्ष में फैसला; कोर्ट बोला, बच्चे की पहचान ऐसे पिता से क्यों, जिसका जीवन में कोई संबंध नहीं

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

  • सिंगल मदर को बच्चे की पूर्ण अभिभावक मानना संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है, न कि कोई उपकार।
  • विकसित समाज में बच्चे की सार्वजनिक पहचान ऐसे पिता से जोड़ना उचित नहीं, जो उसकी जिंदगी में मौजूद ही नहीं।
  • जब मां ही एकमात्र संरक्षक हो, तो स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम हटाकर मां का नाम दर्ज करना किसी सार्वजनिक हित के विरुद्ध नहीं।
  • अनुच्छेद 14 के संदर्भ में केवल पिता के आधार पर पहचान तय करना तटस्थ प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है।

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी बच्चे का पालन-पोषण अकेले करने वाली मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में स्वीकार करना दया नहीं, बल्कि संविधान के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता है। यह फैसला उस याचिका पर आया जिसमें एक दुष्कर्म पीड़िता मां ने अपनी बच्ची के स्कूल रिकॉर्ड से पिता का नाम हटाने की मांग की थी। डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस विभा कांकणवाड़ी और जस्टिस हितेन वेणुगावकर शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि जब पिता का बच्चे के जीवन से कोई संबंध ही नहीं है, तो उसकी पहचान जबरन उससे जोड़ना अनुचित है। अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं देता, बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार भी सुनिश्चित करता है, और पहचान उसी सम्मान का हिस्सा है।

मामला क्या था
मामले में डीएनए जांच से आरोपी को बच्ची का जैविक पिता सिद्ध किया गया था, लेकिन उसने बच्चे से अलग रहने का विकल्प चुना। इसके बावजूद जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज था। स्कूल ने संशोधन से इनकार किया, जिसके बाद मां-बेटी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने कहा कि स्कूल जाति प्रमाणन संस्था नहीं है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में रिकॉर्ड सुधार सकता है।

स्कूल रिकॉर्ड पर कोर्ट का दृष्टिकोण
अदालत ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड निजी नोट नहीं, बल्कि सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं, जो बच्चे के शैक्षणिक और पेशेवर जीवन में लंबे समय तक उपयोग किए जाते हैं। केवल तय फॉर्मेट के कारण पिता का नाम अनिवार्य रखना तर्कसंगत नहीं है। जो प्रशासन पिता का नाम अनिवार्य और मां का नाम वैकल्पिक रखता है, वह दस्तावेजी प्रक्रिया के माध्यम से असमानता को बढ़ावा देता है।

जाति संबंधी पहलू
जाति बदलने के अनुरोध पर कोर्ट ने कहा कि इसे मनमाने तरीके से नहीं बदला जा सकता और स्कूल इस संबंध में अंतिम प्राधिकरण नहीं हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि रिकॉर्ड में वास्तविक त्रुटि है और संशोधन मौजूदा सामाजिक-कानूनी स्थिति को सही दर्शाने के लिए है, तो सुधार संभव है।

बच्चे का हित सर्वोपरि
पीठ ने माना कि जाति प्रमाणपत्र के दुरुपयोग जैसी आशंकाएं उचित हैं, इसलिए राहत देते समय प्रक्रिया की पारदर्शिता और बच्चे के सर्वोत्तम हित दोनों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। यह फैसला प्रशासनिक ढांचे में सिंगल मदर्स के अधिकारों की मान्यता को मजबूत करता है और पहचान को पितृसत्तात्मक परंपराओं से हटाकर संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप देखने का संदेश देता है।

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