
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विषय से जुड़े अंशों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा मंत्रालय ने संबंधित पुस्तक के वितरण पर फिलहाल रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी स्वतः संज्ञान लेते हुए इस पर असंतोष व्यक्त किया था।
मुख्य न्यायाधीश की कड़ी टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बुधवार को इस मुद्दे पर सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी को भी न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था को बदनाम या अपमानित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उनकी इस टिप्पणी के बाद विवाद और तेज हो गया है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल स्तर की पुस्तकों में संवेदनशील विषयों को अत्यंत संतुलित और तथ्यपरक तरीके से प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।
नई पाठ्यपुस्तक में शामिल उक्त विषय पर उठे विवाद के बाद मंत्रालय ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि पुस्तक का प्रसार अगले आदेश तक रोका जाए। यह पुस्तक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित की गई है। सूत्रों के अनुसार मंत्रालय ने परिषद से इस मामले में स्पष्टीकरण भी मांगा है। परिषद ने अपने बयान में कहा कि 24 फरवरी को जारी कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक “एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड, खंड-II” के अध्याय 4 में अनजाने में कुछ त्रुटिपूर्ण सामग्री शामिल हो गई थी। मंत्रालय ने भी इसकी पुष्टि करते हुए पुस्तक के वितरण पर रोक लगाने का निर्देश दिया है। परिषद ने स्पष्ट किया कि पुस्तक का उद्देश्य छात्रों में संवैधानिक अधिकारों की समझ विकसित करना, संस्थाओं के प्रति सम्मान बढ़ाना और लोकतांत्रिक सहभागिता के बारे में जानकारी देना था, न कि किसी संवैधानिक संस्था की छवि पर प्रश्न उठाना। परिषद ने यह भी बताया कि संबंधित अध्याय को विशेषज्ञ सलाह के साथ संशोधित कर शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत में उपलब्ध कराया जाएगा। संस्था ने इस त्रुटि पर खेद जताते हुए रचनात्मक सुझावों का स्वागत करने की बात कही है।
सरकार की प्रतिक्रिया
सरकारी सूत्रों के मुताबिक परिषद भले ही स्वायत्त संस्था है, लेकिन पाठ्यपुस्तक में नए अध्याय जोड़ते समय संबंधित अधिकारियों को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी। उनका कहना है कि यदि भ्रष्टाचार जैसे विषय को शामिल किया जाना था, तो उसे शासन के तीनों अंग कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के संदर्भ में समग्र रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए था।






