
पुराने, निष्क्रिय या कबाड़ हो चुके वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबरों को अवैध रूप से नए वाहनों को आवंटित किया
राजस्थान के परिवहन विभाग में वाहन पंजीकरण से संबंधित एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है, जिसने पूरे विभाग में हलचल मचा दी है। जांच एजेंसियों के अनुसार यह कथित घोटाला करीब 600 करोड़ रुपये का हो सकता है। बताया जा रहा है कि जिस तकनीक और प्रणाली का उपयोग व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए किया जाना चाहिए था, उसी का दुरुपयोग कर बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा किया गया। जांच में सामने आया है कि कुछ आरटीओ अधिकारियों और बिचौलियों के नेटवर्क ने मिलकर पुराने, निष्क्रिय या कबाड़ हो चुके वाहनों के दुर्लभ रजिस्ट्रेशन नंबरों को अवैध रूप से नए वाहनों को आवंटित कर दिया। इन खास नंबरों को लाखों रुपये में बेचा जाता था। जांचकर्ताओं के अनुसार इस पूरे नेटवर्क के जरिए भारी कमाई की गई, खासकर उन लोगों से जो कम अंकों वाले या विशेष वीआईपी नंबर लेने के इच्छुक थे। बताया जा रहा है कि एक ही मामले में 650 से अधिक पुराने “विंटेज” रजिस्ट्रेशन नंबर नए वाहनों के नाम पर ट्रांसफर कर दिए गए। जांच के दौरान राजस्थान के कई जिलों में गड़बड़ियों के मामले सामने आए हैं। जांच अधिकारियों के अनुसार दलालों ने ऐसे वाहन नंबरों को निशाना बनाया जो या तो रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं थे या जिनके दस्तावेज गुम या नष्ट बताए गए थे। ऐसे नंबरों को “घोस्ट रजिस्ट्रेशन” कहा जा रहा है। आरोप है कि विभाग के भीतर मिलीभगत के जरिए इन निष्क्रिय नंबरों को सरकारी वाहन डेटाबेस VAHAN पर दोबारा सक्रिय किया गया और बाद में उन्हें नए वाहनों, विशेषकर महंगी कारों, को आवंटित कर दिया गया
कैसे सामने आया मामला
यह मामला मार्च 2025 में उस समय उजागर हुआ जब पुराने और दुर्लभ रजिस्ट्रेशन नंबरों के लेनदेन में अचानक तेजी देखी गई। जांच में पाया गया कि कई नंबर ऐसे वाहनों से जुड़े थे जो पहले ही कबाड़ हो चुके थे, छोड़े जा चुके थे या कई दशक पहले ग्रामीण इलाकों में पंजीकृत किए गए थे। आरोप है कि दलालों ने इन पुराने आवेदनों को दोबारा सक्रिय कर निर्धारित नीलामी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए नंबर नए वाहनों को आवंटित कर दिए। जांच में यह भी सामने आया है कि एक विशेष रजिस्ट्रेशन नंबर के लिए करीब 4 से 5 लाख रुपये तक वसूले जाते थे, जबकि शुरुआती समय में ऐसे नंबर लगभग 21 हजार रुपये में जारी किए गए थे। यही वजह रही कि यह रैकेट बेहद मुनाफेदार बन गया और लंबे समय तक चलता रहा।
पहली एफआईआर कब दर्ज हुई
इस मामले का पहला आधिकारिक केस जयपुर में दर्ज किया गया। 31 मार्च 2025 को गांधी नगर थाना, जयपुर में एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच का दायरा पूरे राज्य में बढ़ा दिया गया। इसके बाद जयपुर आरटीओ ने संदिग्ध विंटेज नंबर वाले 2,000 से अधिक वाहन मालिकों को नोटिस जारी किए। दिसंबर 2025 में इन नंबरों की जांच के लिए विशेष सत्यापन शिविर भी लगाए गए। परिवहन विभाग ने ऐसे वाहनों के रजिस्ट्रेशन को “लेन-देन न किया जाए” श्रेणी में डाल दिया है। इसके तहत फिलहाल इन वाहनों से संबंधित वाहन की बिक्री या ट्रांसफर तथा रजिस्ट्रेशन से जुड़ी अन्य सरकारी प्रक्रियाओं सहित कई सेवाओं पर रोक लगा दी गई है, मामले में बड़े वित्तीय लेनदेन की आशंका को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी जांच में शामिल हो गया। एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत दस्तावेज मांगे हैं और पैसे के प्रवाह की जांच शुरू कर दी है। शुरुआती आकलन के मुताबिक 2018 से 2023 के बीच सरकारी खजाने को लगभग 500 से 600 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। मामले में कई अधिकारियों और एजेंटों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है। उदाहरण के तौर पर दौसा के तत्कालीन आरटीओ जगदीश अमरावत को नवंबर 2025 में निलंबित कर दिया गया। वहीं जयपुर में तीन अंकों वाले वीआईपी नंबरों के गलत आवंटन से जुड़े मामलों में पुलिस ने 39 लोगों को आरोपी बनाया है। घोटाले के सामने आने के बाद परिवहन विभाग ने राज्यभर में पुराने या विंटेज रजिस्ट्रेशन नंबरों को दोबारा सक्रिय करने पर रोक लगा दी है। साथ ही VAHAN पोर्टल पर डेटा एंट्री और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की निगरानी भी कड़ी कर दी गई है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वाहन पर अवैध तरीके से आवंटित नंबर पाया जाता है तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।
डिजिटल सिस्टम की खामियां उजागर
राजस्थान का यह मामला यह भी दर्शाता है कि डिजिटल सिस्टम में मौजूद छोटी खामियां भी बड़े वित्तीय घोटालों का कारण बन सकती हैं। फिलहाल जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क का पता लगाने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में जुटी हैं, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।





