अबरार की बोली ने फिर दिखाया क्रिकेट कारोबार और सरहदों के बीच तनाव

क्रिकेट को अक्सर ‘जेंटलमैन गेम’ कहा जाता है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में यह खेल लंबे समय से भावनाओं, राजनीति और पहचान के सवालों से भी जुड़ा रहा है। मैदान पर गेंद और बल्ले के बीच होने वाली टक्कर कई बार सीमाओं के पार फैले रिश्तों की परछाईं भी बन जाती है। इंग्लैंड की 100 गेंदों वाली लीग ‘द हंड्रेड’ के हालिया ऑक्शन में पाकिस्तान के मिस्ट्री स्पिनर अबरार अहमद को भारतीय स्वामित्व वाली फ्रेंचाइजी सनराइजर्स लीड्स द्वारा खरीदे जाने के बाद जो बहस छिड़ी है, उसने एक बार फिर यही दिखाया कि क्रिकेट का मैदान कई बार राजनीति, व्यापार और भावनाओं के संगम का मंच बन जाता है। ऑक्शन में अबरार अहमद पर लगभग 1.90 लाख पाउंड यानी करीब 2.34 करोड़ रुपये की बोली लगी। क्रिकेटिंग दृष्टि से देखें तो यह एक साधारण फैसला था। टी-20 और छोटे प्रारूपों के क्रिकेट में मिडिल ओवर्स में विकेट लेने वाले स्पिनरों की मांग हमेशा रहती है। खासकर ऐसे स्पिनर जो अपनी गेंदबाजी में विविधता रखते हों, और बल्लेबाजों को भ्रमित कर सकें। अबरार अहमद इसी श्रेणी के गेंदबाज माने जाते हैं। पाकिस्तान के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्होंने अपनी ‘मिस्ट्री स्पिन’ से कई बल्लेबाजों को परेशान किया है। इसलिए किसी भी फ्रेंचाइजी के लिए उन्हें टीम में शामिल करना रणनीतिक रूप से समझदारी भरा कदम माना जा सकता है।

लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई कि उन्हें भारतीय स्वामित्व वाली टीम ने खरीदा है, चर्चा का स्वर बदल गया। भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट हमेशा सामान्य खेल संबंधों की तरह नहीं रहा। दोनों देशों के राजनीतिक रिश्तों में लंबे समय से तनाव रहा है, और इसका असर क्रिकेट पर भी साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि पिछले डेढ़ दशक से दोनों देशों के बीच कोई द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज नहीं खेली गई है। जब भी दोनों टीमें अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में आमने-सामने होती हैं, वह मुकाबला खेल से कहीं ज्यादा भावनात्मक और प्रतीकात्मक बन जाता है। फ्रेंचाइजी क्रिकेट के शुरुआती दौर में हालांकि तस्वीर अलग थी। इंडियन प्रीमियर लीग के पहले सीजन में पाकिस्तान के कई खिलाड़ी अलग-अलग टीमों के लिए खेले थे। उस समय उम्मीद थी कि क्रिकेट शायद दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने में एक पुल की भूमिका निभा सकता है। लेकिन उसी साल के बाद हालात तेजी से बदल गए और राजनीतिक तनाव ने क्रिकेट को भी अपनी चपेट में ले लिया। इसके बाद से पाकिस्तानी खिलाड़ियों की आईपीएल में वापसी का रास्ता लगभग बंद हो गया।

इसी पृष्ठभूमि में अबरार अहमद की यह खरीद चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक था। कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब भारत की सबसे बड़ी लीग में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को जगह नहीं मिलती, तो भारतीय निवेश वाली फ्रेंचाइजी को दूसरी लीग में ऐसा फैसला क्यों लेना चाहिए। दूसरी ओर कुछ लोगों ने इसे पूरी तरह पेशेवर फैसला बताते हुए कहा कि फ्रेंचाइजी क्रिकेट में खिलाड़ियों का चयन प्रदर्शन और टीम की जरूरतों के आधार पर होना चाहिए, न कि उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर। यह विवाद दरअसल आधुनिक फ्रेंचाइजी क्रिकेट के बदलते स्वरूप को भी सामने लाता है। पिछले एक दशक में क्रिकेट का ढांचा तेजी से वैश्विक हुआ है। आज कई बड़े निवेश समूह दुनिया भर की अलग-अलग लीगों में टीमें खरीद रहे हैं। एक ही फ्रेंचाइजी नेटवर्क दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और इंग्लैंड जैसी लीगों में सक्रिय है। इस वैश्विक मॉडल में टीमों के फैसले अक्सर व्यावसायिक रणनीति और खेल प्रदर्शन के आधार पर लिए जाते हैं।

लेकिन उपमहाद्वीप में क्रिकेट अभी भी केवल खेल नहीं है। यहां यह राष्ट्रीय पहचान और भावनात्मक जुड़ाव का हिस्सा है। यही कारण है कि जब भी भारत और पाकिस्तान से जुड़ा कोई क्रिकेट फैसला सामने आता है, तो वह तुरंत व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है। इस पूरे विवाद का एक और दिलचस्प पहलू भी है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड की नीति के अनुसार सक्रिय भारतीय खिलाड़ी विदेशी लीगों में नहीं खेल सकते। केवल वही खिलाड़ी विदेशी लीगों में भाग ले सकते हैं जो अंतरराष्ट्रीय और घरेलू क्रिकेट से संन्यास ले चुके हों। बोर्ड का तर्क है कि यह नीति आईपीएल की विशिष्टता और आर्थिक ताकत को बनाए रखने के लिए जरूरी है। लेकिन समय के साथ इस नीति को लेकर बहस भी तेज होती जा रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारतीय खिलाड़ियों को विदेशी लीगों में खेलने का मौका मिले, तो उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में खेलने का अनुभव मिलेगा। इससे उनके कौशल में भी निखार आएगा और वैश्विक क्रिकेट में भारतीय खिलाड़ियों की उपस्थिति और मजबूत होगी। यहीं पर एक रोचक विरोधाभास दिखाई देता है। भारतीय निवेशक दुनिया भर की लीगों में टीमों के मालिक बन चुके हैं। वे विदेशी खिलाड़ियों को अपनी टीमों में शामिल कर सकते हैं, लेकिन सक्रिय भारतीय खिलाड़ी उन्हीं टीमों के लिए नहीं खेल सकते। इससे कई बार ऐसा लगता है कि क्रिकेट का वैश्विक कारोबार भारतीय निवेश से तो चल रहा है, लेकिन भारतीय खिलाड़ी उस वैश्विक मंच पर सीमित ही दिखाई देते हैं।

अबरार अहमद की बोली इसी विरोधाभास को उजागर करती है। कल्पना कीजिए कि यदि भारतीय खिलाड़ियों पर विदेशी लीगों में खेलने की पाबंदी न होती, तो शायद किसी भारतीय स्पिनर की चर्चा भी उसी तरह हो रही होती जैसी आज अबरार की हो रही है। दुनिया की अलग-अलग लीगों में भारतीय खिलाड़ियों की मौजूदगी खेल को और दिलचस्प बना सकती थी। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का वर्तमान दौर दरअसल एक विशाल वैश्विक उद्योग का रूप ले चुका है। प्रसारण अधिकार, ब्रांड वैल्यू, स्पॉन्सरशिप और दर्शकों का अंतरराष्ट्रीय बाजार इन सबने क्रिकेट को पहले से कहीं अधिक व्यावसायिक बना दिया है। इस मॉडल में टीमों के लिए सबसे अहम सवाल यह होता है कि कौन सा खिलाड़ी उनकी रणनीति के लिए सबसे उपयोगी होगा। लेकिन इस व्यावसायिक ढांचे के बीच भी क्रिकेट की भावनात्मक प्रकृति खत्म नहीं हुई है। खासकर भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में क्रिकेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक पहचान का हिस्सा है। यही कारण है कि एक खिलाड़ी की नीलामी भी कई बार खेल से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक बहस का रूप ले लेती है।

अबरार अहमद की यह खरीद भी उसी कहानी का हिस्सा है। फ्रेंचाइजी के लिए यह एक साधारण क्रिकेटिंग फैसला हो सकता है, लेकिन दर्शकों के लिए इसमें इतिहास, राजनीति और भावनाएं भी जुड़ जाती हैं। यही वजह है कि हंड्रेड लीग का यह ऑक्शन क्रिकेट मैदान से निकलकर व्यापक चर्चा का विषय बन गया। क्रिकेट का भविष्य शायद इसी संतुलन में छिपा है। एक ओर वैश्विक निवेश और व्यावसायिक मॉडल हैं, दूसरी ओर दर्शकों की भावनाएं और राष्ट्रीय पहचान। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन यही आधुनिक क्रिकेट की सबसे बड़ी चुनौती भी है। अबरार अहमद की यह बोली इसलिए केवल एक खिलाड़ी की खरीद नहीं है। यह उस बदलते क्रिकेट संसार की झलक है, जहां सरहदें, व्यापार और भावनाएं एक ही खेल में अलग-अलग दिशाओं से अपना असर दिखाती हैं। यही कारण है कि क्रिकेट की हर नई कहानी हमें यह याद दिलाती है कि यह खेल अभी भी केवल खेल नहीं है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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