धुरंधर-2 से कैसे बेनकाब हुई अखिलेश की मुस्लिम परस्त राजनीति

रणवीर सिंह अभिनीत फिल्म ‘धुरंधर द रिवेंज’ इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर जितनी धमाकेदार है, उससे कहीं ज्यादा राजनीति के गलियारों में तूफान मचा रही है। फिल्म में ‘अतीक अहमद’ नामक एक ऐसा किरदार दिखाया गया है, जो असल माफिया अतीक अहमद से मेल खाता है। इस किरदार के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से कथित संबंधों को दिखाए जाने को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। फिल्म की कहानी ने जो रंग उड़ाया है, उसमें सबसे ज्यादा बेचैनी समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव को है। और यही बेचैनी खुद ब खुद सपा की मुस्लिम राजनीति की असलियत को बेनकाब कर रही है।अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि सरकार ऐसी प्रोपेगेंडा फिल्में बनाने पर पैसा खर्च कर रही है जो दूसरी पार्टियों को बदनाम करती हैं, और यहां तक कि फिल्म की रिलीज पर भी पैसे बहाए जा रहे हैं। यह बयान राजनीतिक दृष्टि से समझना जरूरी है। अखिलेश यादव की यह प्रतिक्रिया केवल एक फिल्म के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी उस राजनीतिक मजबूरी को दर्शाती है जो मुस्लिम वोट बैंक पर टिकी है।

फिल्म में दिखाया गया है कि किरदार का पाकिस्तान के आईएसआई चीफ से सीधा कनेक्शन है, पंजाब में ड्रोन से गिराए गए अवैध हथियार उस तक पहुंचाए जाते हैं, लश्कर-ए-तैयबा से संबंध हैं और जाली नोट नेपाल के रास्ते भारत लाए जाते हैं। यूपी की राजनीति में भी उसका दखल दिखाया गया है। इस किरदार की पहचान सपा के पूर्व सांसद अतीक अहमद से जोड़ी जा रही है, और यही जुड़ाव समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है।सवाल यह है कि अखिलेश यादव इस फिल्म पर इतने आग-बबूला क्यों हैं? अतीक अहमद समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत चुका था और सपा प्रमुख इस फिल्म को प्रोपेगेंडा करार दे रहे हैं। लेकिन जिस तरह की बेचैनी अखिलेश ने दिखाई है, वह यह साबित करती है कि यह फिल्म उनकी मुस्लिम वोट की राजनीति की नींव हिला रही है। राजनीतिक गलियारों में एक तस्वीर काफी चर्चित रही है, जिसमें सपा नेता मुलायम सिंह यादव अतीक अहमद के घर गए थे। यह रिश्ता केवल एक संयोग नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक समीकरण का हिस्सा था जिसे सपा ने वर्षों तक सींचा।

सपा से ही निष्कासित विधायक पूजा पाल ने सीधे आरोप लगाया कि अतीक अहमद समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा फाइनेंसर था और उसकी मौत का दुख आज भी सपा को सता रहा है। पूजा पाल के इस बयान ने सपा की आंतरिक कलह को सतह पर ला दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अतीक अहमद ने उनकी तरह हजारों युवाओं की जिंदगी बर्बाद की और सपा के संरक्षण में वह वर्षों तक फलता-फूलता रहा।सपा प्रमुख और पूरी समाजवादी पार्टी ‘धुरंधर 2’ को लेकर केंद्र सरकार पर आरोप तो लगा रही है, लेकिन ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों पर उनकी जुबान नहीं खुलती, जिनमें ब्राह्मणों और हिंदुओं को बदनाम किया गया। यह दोहरापन ही सपा की असली राजनीति है। जब बात मुस्लिम समुदाय से जुड़े किरदार की आती है तो पार्टी सड़क पर उतर आती है, लेकिन दूसरे समुदायों को लेकर बनी फिल्मों पर खामोशी साध लेती है।

एआईएमआईएम नेता शौकत अली ने भी दावा किया कि यह फिल्म मुसलमानों को बदनाम करने के लिए बनाई गई है। उन्होंने अतीक अहमद का नाम लिए बिना कहा कि जब वे जिंदा थे तो आईएसआई के एजेंट नहीं थे, लेकिन मरने के बाद उन्हें आईएसआई का एजेंट बना दिया गया। यह बयान दिलचस्प है क्योंकि यह सीधे सपा की मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से जुड़ता है। जब भी ऐसी कोई फिल्म या घटना सामने आती है, विपक्ष एकजुट होकर मुस्लिम भावनाओं को हवा देने की कोशिश करता है।मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पलटवार करते हुए कहा कि अतीक अहमद जो करता था वही फिल्म में दिखाया गया तो इसमें बुरा क्या है। यह जवाब उस बहस की दिशा तय करता है जिसे सपा ने खुद शुरू किया। यदि कोई माफिया वाकई आईएसआई से जुड़ा था, तो उसे पर्दे पर दिखाना क्या गलत है? सपा का विरोध यह संदेश देता है कि वह उस माफिया की विरासत को सुरक्षित रखना चाहती है जो उसके वोट बैंक का हिस्सा रहा।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और ऐसे में यह फिल्म सपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरी है। बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष पंकज चौधरी ने अखिलेश यादव पर पलटवार किया और कहा कि जब सपा की सरकार थी तब उन्होंने कुछ नहीं किया। यानी यह फिल्म उन पुराने घावों को ताजा कर रही है जो सपा अब तक भुलाने में लगी थी। ‘धुरंधर 2’ ने अखिलेश यादव की उस राजनीति की पोल खोल दी है जो एक तरफ पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम वोट समेटने की कोशिश करती है, और दूसरी तरफ उन तथ्यों पर पर्दा डालने की जुगत लगाती है जो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। एक फिल्म ने यह साबित कर दिया है कि मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति पर टिकी सपा की नाव जितनी मजबूत दिखती है, अंदर से उतनी ही खोखली है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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