
एक ओर सैनिक बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर तेहरान को शांति प्रस्ताव भेज रहा है अमेरिका
ईरान के खिलाफ अमेरिका द्वारा शुरू किया गया युद्ध अब खुद उसके लिए मुश्किल बनता जा रहा है। मौजूदा हालात में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दुविधा साफ झलक रही है, वे संघर्ष को और तेज करें या फिर शांति का रास्ता अपनाएं। इस स्थिति के पीछे ईरान की मजबूत और रणनीतिक तैयारी को अहम वजह माना जा रहा है। दरअसल, ट्रंप प्रशासन एक साथ दो दिशाओं में कदम बढ़ाता नजर आ रहा है। एक ओर अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ तेहरान को 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव भेजकर बातचीत की कोशिश कर रहा है। व्हाइट हाउस के सख्त तेवर और कूटनीतिक पहल इस बात का संकेत देते हैं कि प्रशासन अब तक स्पष्ट रणनीति तय नहीं कर पाया है कि युद्ध को आक्रामक तरीके से समाप्त किया जाए या संवाद के जरिए हल निकाला जाए। बीबीसी पर्शियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने हालात से निपटने के लिए समानांतर रणनीति अपनाई है। पेंटागन ने क्षेत्र में जमीनी सैनिकों की तैनाती का आदेश दिया है, जिसके तहत करीब 2000 पैराट्रूपर्स को खार्ग के पास भेजा जा रहा है। वहीं, अमेरिकी प्रतिनिधियों ने ईरान को नया शांति प्रस्ताव भी सौंपा है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस ने चेतावनी दी है कि प्रस्ताव को अस्वीकार करने पर ईरान पर और कड़ा हमला किया जा सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ी चुनौती
तीन हफ्तों से अधिक समय बीतने के बावजूद अमेरिका अब तक होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाया है। यह मार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। ईरान की गतिविधियों के चलते इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही पर खतरा बढ़ गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों में तेजी आई है। पूर्व एनएसए स्टीफन हैडली के अनुसार, यदि इस क्षेत्र पर ईरान का प्रभाव बना रहता है, तो अमेरिका के लिए जीत का दावा करना कठिन होगा। साथ ही, सहयोगी देशों से पर्याप्त समन्वय न होने के कारण अमेरिका को वैश्विक समर्थन जुटाने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
रिपब्लिकन पार्टी में बढ़ती असहमति
इस युद्ध को लेकर अमेरिकी राजनीति में भी मतभेद उभरने लगे हैं। हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने जहां अभियान के जल्द खत्म होने की उम्मीद जताई, वहीं उनकी पार्टी के कुछ नेता इससे सहमत नहीं हैं। रिपब्लिकन सांसद नैन्सी मेस ने 2000 से अधिक सैनिकों की तैनाती का विरोध करते हुए साफ कहा कि वे ईरान में जमीनी सेना भेजने के पक्ष में नहीं हैं। वहीं, हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन माइक रोजर्स ने पेंटागन पर पर्याप्त जानकारी साझा न करने का आरोप लगाया।
जमीनी तैनाती: रणनीति या जोखिम
82वीं एयरबोर्न डिवीजन की तैनाती को ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। संभावित रणनीति में फारस की खाड़ी में स्थित खार्ग द्वीप पर नियंत्रण हासिल करना शामिल हो सकता है, जो ईरान के तेल निर्यात का प्रमुख केंद्र है।
अनिश्चितता बरकरार
कुल मिलाकर, ट्रंप प्रशासन एक तरफ सैन्य बढ़त हासिल करने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर कूटनीतिक समाधान के विकल्प भी खुले रखे हुए है। हालांकि, ईरान के सख्त रुख, अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी और अमेरिका के भीतर राजनीतिक मतभेदों के चलते आगे की दिशा अभी भी स्पष्ट नहीं है।






