अमेरिका ने 3500 मरीन के साथ उतारा यूएसएस त्रिपोली युद्धपोत

ईरान में कुछ बड़ा करने की सोच रहे हैं ट्रंप

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत करते हुए यूएसएस त्रिपोली को लगभग 3,500 मरीन के साथ युद्ध क्षेत्र में तैनात कर दिया है। ईरान के साथ जारी संघर्ष को एक महीना पूरा होने के बाद उठाया गया यह कदम क्षेत्र में दबदबा बनाने और रणनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अत्याधुनिक हथियारों से लैस यह युद्धपोत अमेरिका के सख्त रुख का संकेत देता है। इस बीच क्षेत्र में संघर्ष लगातार तीव्र होता जा रहा है। अमेरिका और इस्राइल के हमलों के बीच ईरान भी जवाबी कार्रवाई करते हुए इस्राइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के चलते हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं और यह टकराव अब 30वें दिन में प्रवेश कर चुका है। ऐसे माहौल में अमेरिका ने अपनी सैन्य रणनीति को और आक्रामक रूप दिया है।

यूएसएस त्रिपोली, जो लगभग एक विमानवाहक पोत के बराबर क्षमता वाला अमेरिका-श्रेणी का उभयचर हमलावर जहाज है, अब अमेरिकी केंद्रीय कमान के क्षेत्र में सक्रिय हो गया है। यह जहाज जापान स्थित अपने बेस से रवाना हुआ था। इसमें हेलिकॉप्टर, MV-22 ऑस्प्रे और F-35B लड़ाकू विमान तैनात किए जा सकते हैं। इसके साथ त्रिपोली उभयचर तत्पर समूह और 31वीं मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट भी तैनात है। इस तैनाती के बाद पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य स्थिति और सुदृढ़ हो गई है। पहले से ही क्षेत्र में यूएसएस निमित्ज और यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड जैसे विमानवाहक पोत मौजूद हैं, हालांकि गेराल्ड आर. फोर्ड को हाल में आग और मरम्मत के कारण पोर्ट ऑफ स्प्लिट में रोका गया है। वहीं, यूएसएस जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश भी नॉर्फोक से इस क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है। इसके तैनात होने पर क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोतों की संख्या तीन तक पहुंच सकती है।

अमेरिकी केंद्रीय कमान ने ईरान के खिलाफ चल रहे ऑपरेशनों की जानकारी भी साझा की है। इसके अनुसार 28 फरवरी के बाद अमेरिकी सेना ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर व्यापक हमले किए हैं। इन अभियानों के दौरान 11,000 से अधिक sorties उड़ाए गए और 150 से ज्यादा ईरानी नौसैनिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाया गया या नष्ट किया गया। साथ ही ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर, मिसाइल ठिकानों, नौसैनिक जहाजों और हथियार निर्माण इकाइयों को भी निशाना बनाया गया है।

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