शांति वार्ता से पहले ही अमेरिका ने पश्चिम एशिया में बढ़ाई ताकत

इस्लामाबाद में प्रस्तावित अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से पहले पश्चिम एशिया का माहौल फिर से तनावपूर्ण होता दिख रहा है। एक ओर अमेरिका कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की तैयारी कर रहा है, तो दूसरी ओर क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को तेजी से मजबूत कर रहा है। 50,000 से अधिक सैनिकों, फाइटर जेट्स और युद्धपोतों की तैनाती इस बढ़ते दबाव को साफ दर्शाती है। वहीं, ईरान भी वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन उसने लेबनान में युद्धविराम को पूर्व शर्त बनाया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पाकिस्तान दौरे पर हैं, जहां वे ईरान के साथ अहम बातचीत में शामिल होंगे। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है, जब पश्चिम एशिया के हालात बेहद नाजुक हैं और किसी भी छोटी घटना से बड़ा टकराव भड़क सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी फाइटर जेट्स और अटैक एयरक्राफ्ट पहले ही क्षेत्र में पहुंच चुके हैं। इसके साथ ही 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 1,500 से 2,000 सैनिकों की अतिरिक्त तैनाती की तैयारी है। समुद्री क्षेत्र में भी हलचल तेज हो गई है। यूएसएस जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अटलांटिक पार कर रहा है, जबकि यूएसएस बॉक्सर एम्फीबियस ग्रुप और 11वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट प्रशांत क्षेत्र से खाड़ी की ओर बढ़ रहे हैं। इन तैनातियों के बाद क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 50,000 के पार पहुंच गई है, जो सामान्य तौर पर करीब 40,000 रहती है। पहले से मौजूद 2,500 मरीन और 2,500 नौसैनिक भी सक्रिय भूमिका में हैं। जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल जमीनी अभियानों में किया जा सकता है, जिसमें ईरान के रणनीतिक ठिकानों जैसे खार्ग द्वीपको निशाना बनाने की संभावना भी शामिल है।

दोहरी रणनीति पर अमेरिका
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर बातचीत असफल रहती है, तो सैन्य विकल्प भी खुला है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी युद्धपोत पूरी तरह तैयार हैं और जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जाएगा। ट्रंप के अनुसार, अगले 24 घंटों में वार्ता की दिशा स्पष्ट हो सकती है। पूरे घटनाक्रम से साफ है कि अमेरिका एक साथ दो मोर्चों पर काम कर रहा है—एक ओर कूटनीतिक समाधान की कोशिश, और दूसरी ओर सैन्य ताकत के जरिए दबाव बनाना। यह रणनीति अमेरिका की स्थिति को मजबूत कर सकती है, लेकिन इससे क्षेत्र में टकराव का खतरा भी बढ़ जाता है।

ईरान की शर्तें और चेतावनी
ईरान ने भी बातचीत के लिए अपनी तैयारी दिखा दी है। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच चुका है। हालांकि, तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि औपचारिक वार्ता से पहले लेबनान में युद्धविराम जरूरी है। ईरान का कहना है कि वह सकारात्मक रुख के साथ बातचीत चाहता है, लेकिन अमेरिका पर उसका भरोसा सीमित है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि अगर वार्ता महज औपचारिकता साबित हुई, तो जवाबी कदम उठाए जाएंगे।

होरमुज जलडमरूमध्य पर बढ़ती चिंता
इस संकट के बीच होरमुज जलडमरूमध्य सबसे अहम केंद्र बना हुआ है, जहां से दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति गुजरती है। पिछले छह हफ्तों से जारी तनाव का असर वैश्विक बाजार और ईंधन कीमतों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 50,000 सैनिक किसी बड़े जमीनी युद्ध के लिए पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि ईरान का विशाल भूभाग और बड़ी आबादी किसी भी सैन्य अभियान को जटिल बना देती है।

अब दुनिया की नजर इस्लामाबाद में होने वाली इस महत्वपूर्ण वार्ता पर टिकी है। यही तय करेगा कि पश्चिम एशिया शांति की राह पकड़ेगा या एक बड़े संघर्ष की ओर बढ़ेगा।

विशिखा मीडिया

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