ट्रंप का नाटो सहयोगियों के प्रति नकारात्मक रुख

क्या अमेरिका के बिना टिक पाएगा नाटो….

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का नाटो सहयोगियों के प्रति सख्त और नकारात्मक रुख हाल के घटनाक्रमों में और स्पष्ट हो गया है। खासकर ईरान से जुड़े सैन्य तनाव में नाटो देशों के शामिल न होने के फैसले ने इस मतभेद को और गहरा कर दिया। ट्रंप ने इस स्थिति को ‘एक ऐसा धब्बा’ बताया है, जो आसानी से मिटने वाला नहीं है।

ट्रंप का नाटो के साथ टकराव कोई नया नहीं है। राजनीति में आने से पहले ही वे इस सैन्य गठबंधन के प्रति आलोचनात्मक रहे हैं। रक्षा बजट में कम योगदान को लेकर उनकी नाराजगी हो या डेनमार्क के नियंत्रण वाले ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात इन सबने गठबंधन में असहजता पैदा की है। ईरान के मुद्दे पर सहयोगियों के पीछे हटने के बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई है। जर्मनी के चांसलर ने इसे ट्रांस-अटलांटिक संबंधों की एक बड़ी परीक्षा बताया है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच नाटो के भीतर यह खींचतान अब टाली नहीं जा सकती। ऐसे में सवाल उठ रहा है, अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो क्या यह गठबंधन टिक पाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई है। नाटो के पूर्व अधिकारी जिम टाउनसेंड के अनुसार, गठबंधन अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां अलगाव की आशंका पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

क्या अमेरिका नाटो से बाहर हो सकता है
वास्तव में, यूएस के लिए नाटो से बाहर निकलना इतना आसान नहीं है। इसके लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत या कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी, जो फिलहाल मुश्किल दिखता है। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के कई नेता अब भी नाटो के पक्ष में हैं। हालांकि, अमेरिका अपने दायित्वों को सीमित जरूर कर सकता है। नाटो की संधि का अनुच्छेद 5 सामूहिक रक्षा की बात करता है, लेकिन यह किसी देश को सैन्य कार्रवाई के लिए बाध्य नहीं करता। ऐसे में यह संदेह बना हुआ है कि संकट की स्थिति में वॉशिंगटन अपने सहयोगियों की कितनी मदद करेगा।

यूरोप में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति पर सवाल
अमेरिका के पास यूरोप में करीब 84,000 सैनिक तैनात हैं, जिन्हें वह वापस बुला सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन उन देशों से सैन्य अड्डे हटाने पर विचार कर चुका है, जिन्हें उसने ईरान संकट के दौरान पर्याप्त सहयोगी नहीं माना। यदि ऐसा होता है, तो नाटो की नींव कमजोर हो सकती है, क्योंकि इसकी शुरुआत से ही यूरोप की सुरक्षा में अमेरिका की भूमिका अहम रही है। हालांकि, यूरोपीय देश पूरी तरह असहाय नहीं हैं। रूस यूक्रेन ने उनकी रक्षा तैयारियों की कमजोरियों को उजागर किया है और अमेरिका पर निर्भरता को भी सामने रखा है। इसी के चलते यूरोपीय देशों ने अपनी रक्षा क्षमताओं में निवेश बढ़ाया है। 2020 से 2025 के बीच उनके रक्षा बजट में 60% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में एक ‘यूरोपीय नाटो’ की अवधारणा भी संभव है। विश्लेषकों के अनुसार, नाटो अब यूरोप के भीतर सैन्य सहयोग का एक मजबूत मंच बन चुका है। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। जर्मन रक्षा प्रमुख के आकलन के मुताबिक, 2029 तक रूस अपनी सैन्य ताकत को इस स्तर तक पुनर्गठित कर सकता है कि वह नाटो क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन जाए।

नाटो इस समय अपने इतिहास के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ती दूरी ने इसके भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि यह गठबंधन मजबूत रूप में उभरता है या फिर धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला जाता है।

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