यूपी: योगी कैबिनेट का विस्तार आज, सपा से आए नेताओं को मिल सकता है मौका

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चल रही अटकलों पर आखिरकार विराम लग गया है। रविवार को होने वाले इस विस्तार में छह नए मंत्री शपथ लेंगे। लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में इस फेरबदल को लेकर चर्चाएं तेज थीं, जिन पर अब आधिकारिक मुहर लगने जा रही है। सूत्रों के अनुसार, मंत्रिमंडल में खाली पड़े छह पदों को भरने के लिए जिन नामों पर सहमति बनी है, उनमें भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी, समाजवादी पार्टी से बागी होकर आए विधायक और पूर्व मंत्री मनोज पांडेय, पूजा पाल, अलीगढ़ जिले के खैर विधानसभा क्षेत्र से विधायक सुरेंद्र दिलेर, कृष्णा पासवान और हंसराज विश्वकर्मा शामिल हैं। बताया जा रहा है कि इन संभावित मंत्रियों में से कुछ ने रविवार दोपहर तीन बजे तक जनभवन पहुंचने की पुष्टि भी कर दी है। इससे पहले शनिवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनभवन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात कर प्रस्तावित मंत्रियों की सूची सौंप दी। इसके बाद से ही शपथ ग्रहण की तैयारियां तेज हो गई हैं।

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मंत्रिमंडल विस्तार आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए काफी अहम माना जा रहा है। इसमें विभिन्न जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति साफ नजर आती है। ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी को दूर करने के उद्देश्य से मनोज पांडेय जैसे प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे को शामिल किया जा रहा है। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाट समाज को साधने के लिए भूपेंद्र चौधरी को मंत्रिमंडल में जगह दी जा रही है। इसके अलावा, ओबीसी, दलित और महिला वोट बैंक को मजबूत करने के लिए पूजा पाल और कृष्णा पासवान को भी मंत्री बनाए जाने की तैयारी है। वाराणसी से एमएलसी और ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधि हंसराज विश्वकर्मा को भी मंत्रिमंडल में शामिल कर सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। साथ ही, अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए सुरेंद्र दिलेर का नाम भी तय माना जा रहा है।

हालांकि, सरकार या पार्टी संगठन की ओर से इन नामों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं की गई है, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक संभावित मंत्रियों को फोन के माध्यम से सूचना दे दी गई है कि वे रविवार को निर्धारित समय तक जनभवन पहुंच जाएं। यह विस्तार न केवल सरकार के कामकाज को नई गति देने का प्रयास है, बल्कि आगामी चुनावों से पहले सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है।

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