ट्रस्ट के कई पदाधिकारी भी सवालों के घेरे में
अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर ट्रस्ट में चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी और गबन का मामला सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ट्रस्ट में अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं, जिनकी जिम्मेदारी मंदिर की व्यवस्थाओं के संचालन से लेकर चढ़ावे की राशि की गिनती और प्रबंधन तक होती है। इनमें चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इसके बावजूद चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी की खबरें सामने आना न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि पूरे प्रबंधन तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

मौजूदा स्थिति को देखते हुए “वही कातिल, वही मुद्दई और वही मुंशिफ” वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आ रही है। चढ़ावे में कथित गबन और हेराफेरी के मामले में ट्रस्ट के ही कई पदाधिकारी जांच के दायरे में हैं। कुछ पर सीधे आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि कई की लापरवाही उजागर हुई है। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि जिनकी निगरानी में यह सब हुआ, उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उन्हीं पदाधिकारियों के रहते निष्पक्ष जांच संभव हो पाएगी, जबकि उनकी पहुंच और प्रभाव भी काफी व्यापक माना जाता है।
घटना के सामने आने के बाद से जिम्मेदार पदाधिकारी पूरी तरह मौन हैं। अब तक किसी भी अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, जिससे संदेह और गहरा गया है। वहीं विशेष जांच दल (एसआईटी) के सामने भी निष्पक्ष जांच करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि जिन लोगों से पूछताछ की जानी है, वे प्रभावशाली पदों पर आसीन हैं। इसके अलावा जिन संदिग्धों पर सीधे आरोप हैं, उनका संबंध भी कहीं न कहीं ट्रस्ट से जुड़े लोगों या उनके परिचितों से बताया जा रहा है।
इस पूरे मामले में रकम को लेकर भी तरह-तरह के दावे सामने आ रहे हैं। अब तक पांच संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है और उनकी निशानदेही पर करीब तीन करोड़ रुपये बरामद हुए हैं। प्रारंभिक तौर पर गबन की रकम आठ करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही थी, लेकिन अब सोशल मीडिया पर यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ तक पहुंचने की चर्चा है। यहां तक कि दो सौ करोड़ रुपये तक की रकम गबन होने की बात कही जा रही है, हालांकि इन दावों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वास्तविक स्थिति एसआईटी की जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। सूत्रों के अनुसार, केवल नकद राशि ही नहीं बल्कि चढ़ावे में आए जेवरात भी बड़ी मात्रा में गायब बताए जा रहे हैं। इसमें सोना-चांदी के करोड़ों रुपये मूल्य के आभूषण शामिल हो सकते हैं। यहां तक कि दो किलो सोने की गदा के गायब होने की भी चर्चा है, हालांकि इस संबंध में भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य नृपेंद्र मिश्र का कहना है कि अब जांच को तेज गति से आगे बढ़ाया जाएगा और इसमें दोषियों के साथ-साथ व्यवस्थागत खामियों की भी गहन पड़ताल की जाएगी। उनका कहना है कि यह घटना मंदिर प्रशासन के लिए एक चुनौतीपूर्ण मोड़ है, लेकिन आगे का लक्ष्य श्रद्धालुओं के विश्वास को और अधिक मजबूत करना है। वहीं विनय कटियार ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा और सभी को जेल भेजा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रस्ट के सदस्य भी जांच के दायरे में हैं और किसी को भी छूट नहीं मिलनी चाहिए। बाबरी मस्जिद के पूर्व पक्षकार इकबाल अंसारी ने इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है। उन्होंने एसआईटी पर भरोसा जताते हुए कहा कि सच्चाई सामने आनी चाहिए और दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान का धन सुरक्षित रहेगा और सच्चाई अवश्य उजागर होगी। जांच में यह भी सामने आया है कि चढ़ावे की गिनती के लिए बैंक द्वारा एक कंपनी के माध्यम से कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग पर रखा गया था, लेकिन इन कर्मचारियों के चयन में ट्रस्ट की भूमिका रही। आरोप है कि नियुक्त किए गए कई कर्मचारी पदाधिकारियों के रिश्तेदार या परिचित थे। इस प्रक्रिया में न तो उचित निगरानी की गई और न ही कर्मचारियों का सत्यापन या तलाशी सुनिश्चित की गई, जिससे गड़बड़ी की आशंका बढ़ गई। बैंक की भूमिका भी पूरी तरह संदेह से परे नहीं मानी जा रही है। सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी इस तरह की घटनाएं होना गंभीर चिंता का विषय है। मंदिर परिसर में पुलिस और अर्द्धसैनिक बल तैनात हैं, लेकिन ट्रस्ट के कर्मचारियों को बिना कड़ी जांच के आवागमन की छूट थी। जानकारी के अनुसार, कई कर्मचारियों को कम वेतन पर लंबे समय तक काम कराया जा रहा था, जिससे उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।
इस पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी एक पत्र याचिका दायर की गई है, जिसमें दान और चढ़ावे के प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई है। याचिका में मंदिर कोष के संग्रह, लेखा-जोखा और वितरण पर न्यायिक निगरानी तंत्र स्थापित करने का भी आग्रह किया गया है। सूत्र बताते हैं कि कुंभ और माघ मेले जैसे बड़े आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण चढ़ावे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी। इसी का फायदा उठाकर कथित तौर पर रोजाना लाखों रुपये की हेराफेरी की गई। यह भी आशंका जताई जा रही है कि भीड़भाड़ वाले समय में निगरानी कमजोर होने का लाभ उठाकर इस तरह की गतिविधियों को अंजाम दिया गया। कुल मिलाकर यह मामला केवल आर्थिक गड़बड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मंदिर प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सबकी निगाहें एसआईटी की जांच पर टिकी हैं, जिससे सच्चाई सामने आने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है।





