विधानसभा में शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सदन में आक्रामक तेवर में नजर आए। उन्होंने अपने संबोधन में केंद्रीय एजेंसियों, विपक्षी पार्टी भाजपा और विरोधियों पर जमकर प्रहार किया। शुरुआत उन्होंने शायरी से की और कहा, हमारे कदम चलते रहेंगे, जब तक सांसें रहेंगी, हम वह मुसाफिर नहीं जो बाधा देखकर चलना छोड़ दें। भाजपा पर उन्होंने लगातार बाधाएं उत्पन्न करने के आरोप लगाए। सोरेन ने सदन में कहा, इसमें उनकी कोई गलती नहीं। दरअसल, उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा काम आता भी नहीं। पिछले चार वर्षों में राज्य सरकार ने किसी को भूखा नहीं मरने दिया। 20 लाख लोगों को हमने राशन कार्ड मुहैया कराए हैं, जबकि पिछली सरकार ने 11 लाख लोगों के नाम काट दिए थे। हमें विरासत में समस्याएं ही मिली हैं।
झारखंड का पहला बजट सरप्लस था तो फिर घाटे का बजट कैसे बनने लगा। विपक्ष पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार बनने के बाद से ही डराने-धमकाने का निरंतर प्रयास चलने लगा। एक घंटे बाद से ही कहा जाने लगा कि सरकार नहीं चलेगी, लेकिन आप जान लीजिए कि हमारी सरकार अपना कार्यकाल भी पूरा करेगी और अगली सरकार भी हमारी ही होगी। विधानसभा और लोकसभा-राज्यसभा की तुलना मंदिरों से करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि ये ऐसे मंदिर हैं जहां जनता के सवालों का समाधान निकलता है। विपक्ष को तीन सदस्य निलंबित होने की तकलीफ है, लेकिन दूसरी ओर केंद्र में एक तिहाई सांसदों को निलंबित कर दिया गया है। ये लोग बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं।
सदन में स्थानीयता से संबंधित 1932 के विधेयक के सर्वसम्मति से पास होने के बाद भाजपा के नेता राज्यपाल का कान भरने चले गए। उन्हें लगा कि क्योंकि राज्यपाल केंद्र से मनोनीत होते हैं सो वहां उनकी बात सुनी जाएगी। विपक्ष राजभवन जाकर कान भरने का काम करने लगा, लेकिन हम बता दें कि हमारी सरकार दिल्ली और रांची से नहीं चलती, बल्कि झारखंड के पंचायतों व गांवों में बैठे यहां के लोगों की भावनाओं के अनुरूप चलती है। गरीब, मजबूर लोगों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता है। विपक्ष के लोगों को बताना चाहिए कि उन्होंने झारखंड को क्या दिया है। इस दौरान भाजपा के विधायक और नेता प्रतिपक्ष बाहर निकल गए। मुख्यमंत्री आगे बोले, विपक्ष की यही समस्या है। अपनी बात बोलना चाहता है लेकिन वे सच्चाई सुन नहीं सकते।
देश में जब लॉकडाउन लगा तो 15 लाख लोग बाहर थे। पेट चलाने के लिए काम करना ही होगा। जब उत्तराखंड में मजदूर फंसे थे तो राज्य सरकार के अधिकारी वहां जाकर कैंप किए और उनके सुरक्षित निकलने तक डटे रहे। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र ने राज्य सरकारों के संसाधन सीमित कर दिए हैं। राजस्व उगाही के जितने दरवाजे थे सभी पर केंद्रीय एजेंसियां बैठा दी गई हैं। वो जानते हैं कि राजस्व बंद होगा तो लोग टूटेंगे। केंद्र सरकार ने खेती-किसानी को बर्बाद करने के लिए तीन काले कानून लांच किए थे। किसानों का आंदोलन हुआ तो तीनों कानून केंद्र सरकार को वापस लेने पड़े।






