असम के शाही परिवार का कब्रिस्तान, यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल

अहोम मोइदम का क्षेत्रफल 95.02 हेक्टेयर है और इसका बफर जोन 754.511 हेक्टेयर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चराइदेव स्थित मोइदम के भीतर 90 संरचनाएं हैं, जो ऊंची भूमि पर स्थित हैं।
असम के चराइदेव जिले में स्थित अहोम युग के ‘मोइदम’ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया है। पूर्वोत्तर से पहली बार किसी धरोहर ने इस सूची में जगह बनाई है। बता दें कि अहोम मोइदम पिरामिड सरीखी अनूठी टीलेनुमा संरचनाएं हैं, जिनका इस्तेमाल ताई-अहोम वंश द्वारा अपने राजवंश के सदस्यों को उनकी प्रिय वस्तुओं के साथ दफनाने के लिए किया जाता था। यानी ये असम के शाही परिवारों का कब्रिस्तान है। इसे शामिल करने की सिफारिश अंतरराष्ट्रीय सलाहकार संस्था आईसीओएमओएस ने की थी। अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिषद (आईसीओएमओएस) ने ‘सांस्कृतिक एवं मिश्रित संपत्तियों के नामांकन का मूल्यांकन’ रिपोर्ट तैयारी की थी। इस रिपोर्ट को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले विश्व धरोहर समिति डब्ल्यूएचसी) के 46वें सत्र में पेश किया गया। यहां यह फैसला लिया गया कि इसे मोइदम को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाएगा। इसी के साथ ‘मोइदम्स’ इस सूची में जगह बनाने वाली पूर्वोत्तर भारत की पहली सांस्कृतिक संपत्ति बन गई। भारत ने 2023-24 के लिए यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के लिए देश की ओर से नामांकन के रूप में ‘मोइदम्स’ का नाम दिया था। ताई-अहोम राजवंश ने असम पर लगभग 600 साल तक शासन किया था।
शाही परिवार का कब्रिस्तान
अहोम मोइदम का क्षेत्रफल 95.02 हेक्टेयर है और इसका बफर जोन 754.511 हेक्टेयर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चराइदेव स्थित मोइदम के भीतर 90 संरचनाएं हैं, जो ऊंची भूमि पर स्थित हैं। इन्हें ईंट, पत्थर या मिट्टी से बने खोखले मिट्टी के टीले जैसा बनाया गया था। इसमें एक अष्टकोणीय दीवार के केंद्र में एक मंदिर बनाया गया था। चराइदेव में स्थित मोइदम अहोम राजाओं और रानियों का कब्रिस्तान है। ये मध्यकालीन युग के असम के कलाकारों की शानदार वास्तुकला और विशेषज्ञता का नमूना है। संस्कृति मंत्री शेखावत ने ‘मोइदम’ को लेकर कहा कि यह दिन स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया, क्योंकि भारत को विश्व धरोहर सूची में 43वीं संपत्ति मिली। उन्होंने यूनेस्को का भी आभार जताया।
क्यों खास है मोइदम
ये टीले अपनी बनावट के लिए बेहद खास हैं और अहोम के विदेशी प्रभावों को दर्शाते हैं। ये पूरे ऊपरी असम में पाए जाते हैं, जहां अहोम की पहली राजधानी चरईदेव है। चराईदेव में अहोम राजवंश को पूरे ताई-अहोम संस्कारों से दफनाया गया है। इस जगह को काफी पवित्र माना जाता है। हर मोइदम में तीन हिस्से होते हैं। पहला, एक कमरा या वॉल्ट जिसमें शरीर को रखा जाता है। दूसरा, कमरे को ढकने वाला एक अर्धगोलाकार टीला और तीसरा शीर्ष पर ईंट की एक संरचना होती है, जिसे चाव चाली कहा जाता है। मोइदम्स का आकास छोटे टीले से लेकर बड़ी पहाड़ियों तक होता है।
यह भी विश्व धरोहर की सूची में शामिल
वहीं, यूनेस्को ने कहा कि गाजा में संघर्ष के बीच फलस्तीन में सेंट हिलारियन मठ/टेल उम्म आमेर को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। लेबनान, तुर्किये, कजाकिस्तान तथा अन्य देशों ने इस फैसले का स्वागत किया।
असम के लिए एक बड़ी जीत: मुख्यमंत्री सरमा
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, ‘मोइदम ने सांस्कृतिक संपत्ति श्रेणी के तहत यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में जगह बनाई है। असम के लिए एक बड़ी जीत है। यह पहली बार है जब उत्तर पूर्व का कोई स्थल सांस्कृतिक श्रेणी के तहत यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ है और काजीरंगा और मानस राष्ट्रीय उद्यानों के बाद यह असम का तीसरा विश्व धरोहर स्थल है।’
क्या है आईसीओएमओएस?
फ्रांस स्थित आईसीओएमओएस, सांस्कृतिक विरासतों के लिए यूनेस्को का एक सलाहकार निकाय है। यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है जिसमें पेशेवर, विशेषज्ञ, स्थानीय अधिकारियों, कंपनियों और विरासत संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। यह निकाय दुनिया भर में वास्तुकला और परिदृश्य विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करता है।

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