पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति ने 191 दिनों में “एक देश-एक चुनाव” पर अपनी रिपोर्ट तैयार की। इस दौरान, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराने से पहले दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, बेल्जियम, जर्मनी, जापान, इंडोनेशिया और फिलीपींस में चुनाव प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन किया गया। इन देशों में चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते हैं।
“एक देश-एक चुनाव” शुरुआत कैसे हुई
- 2019 में 73वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “एक देश-एक चुनाव” की अवधारणा को प्रस्तुत किया।
- 2024 के स्वतंत्रता दिवस पर भी उन्होंने इस विचार पर जोर दिया।
- मार्च 2023 में कोविंद समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी।
- 18 सितंबर को केंद्रीय कैबिनेट ने रिपोर्ट को मंजूरी दी।
- 12 दिसंबर को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने “एक देश-एक चुनाव” विधेयक को स्वीकृति दी।
- अब इसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है।
विरोध और समर्थन
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे अलोकतांत्रिक और अतार्किक बताया। वहीं, भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने इसे समय की आवश्यकता बताते हुए समर्थन दिया।
सुझाव और क्रियान्वयन
कोविंद समिति ने सिफारिश की है कि:
• पहले चरण में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हों।
• दूसरे चरण में स्थानीय निकाय चुनाव 100 दिनों के भीतर आयोजित किए जाएं।
• समान मतदाता सूची तैयार हो और एक कार्यान्वयन समूह का गठन किया जाए।
इसके लिए संविधान में 18 संशोधन प्रस्तावित हैं।
दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों का उदाहरण
• दक्षिण अफ्रीका: नेशनल असेंबली और प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते हैं।
• स्वीडन: आनुपातिक चुनाव प्रणाली अपनाई जाती है, जिसमें हर चार साल में एक साथ चुनाव होते हैं।
• इंडोनेशिया: 2019 से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, और संसद के चुनाव एक साथ कराए जा रहे हैं।
• जर्मनी और जापान: समिति ने इन देशों की चुनाव प्रक्रिया का विश्लेषण कर उनके मॉडल की प्रशंसा की।
निष्कर्ष
“एक देश-एक चुनाव” पर कोविंद समिति की रिपोर्ट ने वैश्विक अनुभवों के आधार पर सिफारिशें दी हैं। यदि इसे लागू किया जाता है, तो यह भारत के चुनावी प्रक्रिया में बड़ा बदलाव ला सकता है।




