भारत के डॉक्टरों ने रक्त कैंसर के इलाज में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर के डॉक्टरों ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के सहयोग से एक क्लिनिकल ट्रायल किया है, जिसमें दावा किया गया है कि मात्र नौ दिन में रक्त कैंसर को खत्म किया गया है। इस उपचार पद्धति को “वेल कार-टी” नाम दिया गया है। पहली बार कार-टी सेल्स को भारत में ही अस्पताल स्तर पर तैयार कर मरीजों को दिया गया। डॉक्टरों के अनुसार, इस परीक्षण में 80% मरीज 15 महीने बाद भी कैंसर-मुक्त पाए गए। आईसीएमआर ने इसे कैंसर चिकित्सा में बड़ी सफलता बताया है और कहा है कि यह इलाज न केवल तेज और सस्ता है, बल्कि इसे मरीजों के नजदीक उपलब्ध कराया जा सकता है।

कार-टी थेरेपी से हुआ इलाज
इस परीक्षण में कार-टी थेरेपी का उपयोग किया गया, जिसमें मरीज की खुद की टी-कोशिकाओं को संशोधित कर उन्हें कैंसर से लड़ने योग्य बनाया गया। यह प्रयोग एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) और लार्ज बी-सेल लिम्फोमा (एलबीसीएल) जैसे रक्त कैंसर के मरीजों पर किया गया। हालांकि भारत में यह तकनीक पहली बार नहीं अपनाई गई है, 2023 में इम्यूनो एक्ट और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई ने भी स्वदेशी कार-टी थेरेपी विकसित की थी।
पहले ट्रायल में उत्साहजनक परिणाम
आईसीएमआर ने बताया कि ट्रायल में एएलएल से पीड़ित सभी मरीज ठीक हो गए, जबकि एलबीसीएल रोगियों में से 50% पूर्णतः स्वस्थ हुए। कुल मिलाकर, 80% मरीज 15 महीने बाद भी रोग-मुक्त रहे। इलाज के दौरान कुछ हल्के साइड इफेक्ट्स देखे गए, लेकिन किसी भी मरीज में न्यूरो टॉक्सिसिटी नहीं पाई गई।
दुनियाभर में 40 दिन लगते हैं, भारत में सिर्फ 9 दिन
इस तकनीक को वेल्लोर स्थित अस्पताल में स्वचालित मशीनों से विकसित किया गया, जिसमें केवल नौ दिन लगे। वैश्विक स्तर पर इसी प्रक्रिया में लगभग 40 दिन का समय लगता है। भारत ने इस तकनीक को 90% तक सस्ता बना दिया है।
उपचार खर्च में 90% तक की बचत
जहां दुनिया में कार-टी थेरेपी की लागत 3 से 4 करोड़ रुपये तक पहुंचती है, वहीं वेल कार-टी मॉडल ने इसे बेहद सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराने की राह खोल दी है। भारत में हर साल करीब 50,000 नए ल्यूकेमिया मरीज सामने आते हैं, ऐसे में यह तकनीक एक क्रांतिकारी कदम मानी जा रही है।






