बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय बाद जमात-ए-इस्लामी पार्टी फिर से सक्रिय हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने इस पार्टी पर लगी रोक हटा दी है, जिससे अब यह पार्टी चुनाव लड़ सकती है। यह फैसला करीब एक दशक तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आया है।
क्या थी 1971 के युद्ध में जमात-ए-इस्लामी की भूमिका
बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान का समर्थन किया था और बंगाली राष्ट्रवाद का विरोध किया था। इस पार्टी पर आरोप हैं कि उसने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर बंगाली नागरिकों के खिलाफ अत्याचार किए, जिनमें हत्याएं, बलात्कार और बुद्धिजीवियों का नरसंहार शामिल है।
प्रतिबंध क्यों और कब लगा
स्वतंत्रता के बाद जमात के कई नेता देश छोड़ गए थे। शेख मुजीब-उर-रहमान ने संविधान में धर्मनिरपेक्षता को शामिल कर धार्मिक पार्टियों पर प्रतिबंध लगाया था। लेकिन 1975 में उनकी मृत्यु और सेना के शासन के दौरान जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक वापसी हुई। 2008 में शेख हसीना के सत्ता में आने पर युद्ध अपराधों के लिए जमात के नेताओं पर कार्रवाई हुई और पार्टी पर पुनः प्रतिबंध लगा दिया गया।
अब यह वापसी कैसे संभव हुई
2024 में शेख हसीना के सत्ता छोड़ने और मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनने के बाद परिस्थितियाँ बदलीं। छात्र आंदोलन में जमात के छात्र संगठन की सक्रियता से पार्टी की ताकत फिर से उभरी और अब यह पार्टी राजनीतिक मुख्यधारा में वापस आई है।
भारत पर इसका क्या असर
- सुरक्षा का खतरा: जमात-ए-इस्लामी के पाकिस्तान और आईएसआई से जुड़े होने की आशंकाएँ पहले भी भारत में रही हैं। उनकी सक्रियता से पूर्वोत्तर भारत में कट्टरपंथी गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं।
- भारत-बांग्लादेश संबंध: यूनुस सरकार पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोशिश में है। जमात का प्रभाव सरकार की नीतियों में दिख सकता है, जिससे भारत और बांग्लादेश के रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
- चीन और रोहिंग्या मुद्दा: जमात के प्रतिनिधियों ने हाल ही में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से मुलाकात की है और रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए अलग राष्ट्र का प्रस्ताव रखा है। यह म्यांमार और भारत के लिए कूटनीतिक और सीमावर्ती चुनौतियाँ पैदा कर सकता है।






