बिहार: नामांकन के अंतिम दिन तक महागठबंधन में सीटों के लिये घमासान

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए शुक्रवार, 17 अक्टूबर को नामांकन का अंतिम दिन है, लेकिन उससे पहले ही विपक्षी इंडी गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर घमासान चरम पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के बीच सीटों की हिस्सेदारी को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं, वहीं तीसरे और छोटे सहयोगी दल भी अपनी-अपनी सियासी हैसियत के हिसाब से ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं। गठबंधन को एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरना था ताकि सत्ता पक्ष को टक्कर दी जा सके, लेकिन आज की स्थिति देखकर लगता है कि अंदरूनी सिर फुटव्वल ने विपक्षी एकजुटता की तस्वीर को धुंधला कर दिया है। बिहार की सियासत में राजद और कांग्रेस का साथ नया नहीं है, लेकिन इस बार की परिस्थिति कुछ अलग है। लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाने वाली पार्टी राजद को गठबंधन का नेतृत्वकर्ता दल माना जा रहा है, जबकि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक और राष्ट्रीय पहचान के आधार पर अधिक सीटों की मांग पर अड़ी हुई है। इसी मुद्दे को लेकर बीते बुधवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पटना में राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। मुलाकात बंद कमरे में करीब एक घंटे तक चली, जिसमें तेजस्वी यादव भी मौजूद थे। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने करीब 80 सीटों की मांग रखी है, जबकि राजद उसे 50 से अधिक देने के मूड में नहीं है। इस खींचतान के बीच यह गठबंधन कमजोर दिखने लगा है।
राजद की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि बिहार में उनकी संगठनात्मक पकड़ कांग्रेस से कहीं ज्यादा गहरी है। 2020 के चुनाव में भी कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन केवल 19 सीटें जीत पाई थी। इससे राजद नेतृत्व यह तर्क दे रहा है कि कांग्रेस का प्रदर्शन उम्मीद से काफी खराब रहा था, इसलिए इस बार उसे कम सीटों पर लड़ा जाना चाहिए। उधर कांग्रेस का कहना है कि उसकी उपस्थिति राज्य के लगभग सभी जिलों में है और गठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने के लिए उसे पर्याप्त राजनीतिक स्पेस मिलना चाहिए। दोनों दलों के बीच सीटों की अपनी-अपनी दावेदारी के बीच इन दलों की राजनीतिक बयानबाजी सड़क चौराहों पर पहुंच गई है, जिससे कार्यकर्ताओं में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश साहनी गठबंधन में असंतोष के सबसे मुखर आवाज बनकर उभरे हैं। साहनी, जो खुद को ‘मल्लाह समाज का चेहरा’ बताते हैं, को अब तक केवल 4 से 5 सीटों की पेशकश की गई है, जबकि वे कम से कम 15 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की मांग कर रहे हैं। राजद नेताओं का कहना है कि वीआईपी की संगठनात्मक ताकत सीमित है और इतनी सीटें देना समीकरणों के हिसाब से संभव नहीं है। इससे नाराज मुकेश साहनी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने का ऐलान किया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि साहनी इंडी गठबंधन छोड़ स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं या किसी तीसरे मोर्चे से हाथ मिला सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो गठबंधन की एकजुटता और कमजोर पड़ जाएगी।
उधर, कांग्रेस और राजद के बीच जो पेंच फंसा है, उसमें मध्यस्थता की जिम्मेदारी वामपंथी दलों को सौंपी गई है। लेकिन सीपीआई और सीपीएम जैसे दलों की राज्य में सीमित ताकत होने के कारण वे इस विवाद को सुलझा पाने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। बीजेपी और एनडीए खेमे में इस खेमेबाजी को लेकर खुशी का माहौल है। एनडीए रणनीतिकारों का कहना है कि जब विपक्ष खुद एक मंच पर नहीं टिक पा रहा तो जनता को क्या भरोसा दिलाएगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुनः सत्ता में आने के बाद से राजद और कांग्रेस लगातार एनडीए सरकार पर बेरोजगारी, महंगाई, किसान मुद्दों और भ्रष्टाचार को लेकर हमले कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी मतभेदों ने उनकी राजनीतिक धार को कुंद कर दिया है।बिहार के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सीट बंटवारा केवल संख्या का खेल नहीं बल्कि जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय प्रभाव और स्थानीय नेतृत्व की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ होता है। राजद यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिके रहना चाहता है, जबकि कांग्रेस ब्राह्मण, बनिया और अनुसूचित जाति के मतदाताओं को साधने की रणनीति बना रही है। वीआईपी का आधार मल्लाह समुदाय में है, और इस वर्ग के वोट कई सीटों पर निर्णायक हो सकते हैं। यदि यह वर्ग अलग दिशा में चला गया, तो नुकसान राजद-कांग्रेस गठबंधन को ही होगा।अंदरूनी खींचतान का दूसरा पहलू स्थानीय नेताओं की नाराजगी है। राजद के कुछ पुराने नेताओं को टिकट वितरण की प्रक्रिया में परिवारवाद का आरोप लगाते हुए विरोध दर्ज कराते देखा गया है। कई जगहों पर कार्यकर्ताओं ने कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन किया है। कांग्रेस में भी असंतोष खुलकर सामने आ गया है, क्योंकि टिकट मांगने वालों की संख्या अत्यधिक है लेकिन सीटें सीमित। राहुल गांधी और लालू यादव की बैठक से पहले कांग्रेस हाईकमान ने अपने बिहार प्रभारी को निर्देश दिया था कि वे युवा चेहरों को प्राथमिकता दें, लेकिन इससे पुराने नेताओं में असंतोष फैला है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि राहुल गांधी की लालू यादव से मुलाकात एक ‘सेव-द-एलायंस’ प्रयास थी, जहां दोनों वरिष्ठ नेताओं ने गठबंधन को अंतिम क्षण तक टूटने से बचाने की कोशिश की है। लेकिन बिहार जैसे राज्य में, जहां जातीय और क्षेत्रीय समीकरण हर चुनाव को प्रभावित करते हैं, वहां सीट बंटवारा केवल ऊपर के स्तर का समझौता नहीं बल्कि जमीनी परिघटना होती है। अगर इस पर मजबूत तालमेल नहीं बैठा तो उम्मीदवारी फॉर्म भरने के अंतिम दिन तक कई सीटों पर गठबंधन की स्थिति अस्पष्ट रह सकती है। अब जबकि नामांकन की अंतिम तारीख सिर पर है, हर घंटे गठबंधन के भीतर नई खींचतान और बयानबाजियां सामने आ रही हैं। राजद चाहती है कि अंतिम सूची इसी रात तक जारी कर दी जाए ताकि शुक्रवार को नामांकन संभव हो सके, जबकि कांग्रेस ने अपने केंद्रीय नेतृत्व की दिल्ली में बैठक बुला ली है। उसी समय मुकेश साहनी की प्रेस कॉन्फ्रेंस और उसके संभावित नतीजे पूरे समीकरण को और उलझा सकते हैं।
बिहार की जनता इन सब राजनीतिक जटिलताओं को बारीकी से देख रही है। जनता के लिए मुद्दे वही हैं रोजगार, शिक्षा, कानून व्यवस्था और महंगाई लेकिन विपक्ष जब खुद के भीतर बंटा हुआ दिखता है तो उसकी वैकल्पिक राजनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। 2020 के चुनाव में भी विपक्षी एकता के बावजूद एनडीए ने मुश्किल से जीत हासिल की थी, पर इस बार के भीतरूनी मतभेद विपक्ष को और कमजोर बना सकते हैं। कल के दिन नामांकन की अंतिम तिथि बीतते ही तस्वीर कुछ साफ जरूर होगी कि गठबंधन एकजुट होकर मैदान में उतरता है या सीट बंटवारे की इस खींचतान में उसका ढांचा बिखर जाता है। अभी के संकेत बताते हैं कि राहुल गांधी और लालू यादव की बैठक के बावजूद समन्वय पूरी तरह नहीं बन पाया है। ऐसे में बिहार के मतदाता अब इस इंतजार में हैं कि क्या विपक्षी दल अपनी अंतर्विरोधी राजनीति से ऊपर उठकर सत्ता पक्ष को वास्तविक चुनौती देंगे या फिर आंतरिक सिर फुटव्वल ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगी।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ

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