पांच करोड़ रुपये से अधिक कीमत है इन कारों की, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर उठने लगे सवाल
देश की सर्वोच्च भ्रष्टाचार निरोधक संस्था लोकपाल अब अपने प्रशासनिक और लॉजिस्टिक ढांचे को और मजबूत करने की तैयारी में है। इसी के तहत लोकपाल कार्यालय ने सात बीएमडब्ल्यू 330 एलआई (लॉन्ग व्हील बेस) कारों की खरीद की प्रक्रिया शुरू की है। इसके लिए 16 अक्तूबर को सार्वजनिक निविदा (टेंडर) जारी की गई है, जिसमें इच्छुक सप्लायर्स से बोली लगाने का आमंत्रण दिया गया है। लोकपाल के इस निर्णय को लेकर विशेषज्ञों के बीच भिन्न मत सामने आए हैं। कुछ इसे संस्था की कार्यक्षमता और प्रशासनिक व्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि इतनी महंगी गाड़ियों की खरीद पर सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, प्रत्येक बीएमडब्ल्यू 330 एलआई की कीमत 60 लाख रुपये से अधिक है। इस प्रकार, सातों गाड़ियों की कुल कीमत पांच करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है। बोली की तकनीकी जांच 7 नवंबर से शुरू होगी। गाड़ियों की डिलीवरी के बाद बीएमडब्ल्यू इंडिया के विशेषज्ञ लोकपाल कार्यालय के ड्राइवरों और कर्मचारियों को एक सप्ताह का प्रशिक्षण देंगे, जिसमें सुरक्षा फीचर्स, संचालन प्रणाली और वाहन की तकनीकी जानकारी शामिल होगी। लोकपाल के एक अधिकारी ने बताया कि यह कदम संस्था की परिवहन और प्रशासनिक सेवाओं को आधुनिक और कुशल बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। हालांकि, इन गाड़ियों की खरीद को लेकर सार्वजनिक धन के उपयोग की पारदर्शिता और आवश्यकता पर बहस छिड़ गई है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भ्रष्टाचार-रोधी संस्था से अपेक्षा की जाती है कि वह सादगी और जवाबदेही का उदाहरण पेश करे।
गौरतलब है कि लोकपाल एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत की गई थी। यह संस्था जन लोकपाल आंदोलन (2010) के बाद अस्तित्व में आई, जिसका नेतृत्व समाजसेवी अन्ना हजारे ने किया था। वर्तमान में लोकपाल के चेयरपर्सन न्यायमूर्ति अजय माणिकराव खानविलकर हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रह चुके हैं।
लोकपाल को प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसदों और केंद्र सरकार के अधिकारियों (ग्रुप A, B, C और D) के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की जांच करने का अधिकार प्राप्त है। इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित बोर्ड, निगम, ट्रस्ट और वे संस्थाएं जो 10 लाख रुपये से अधिक का विदेशी अंशदान प्राप्त करती हैं, वे भी इसके दायरे में आती हैं। राज्य स्तर पर इसी तरह की जांच के लिए लोकायुक्त की व्यवस्था की गई है।





