यह मामला वर्ष 2013 से संबंधित है, जब एक्सिस बैंक लिमिटेड ने सुंदेव अप्लायंसेज लिमिटेड को लगभग ₹16.69 करोड़ का ऋण प्रदान किया था। इसके बदले महाराष्ट्र के वसई स्थित एक संपत्ति को गिरवी रखा गया था।
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि भूमि पर कब्जे या बेदखली से जुड़ी शिकायतों के मामलों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उपयोग किसी बैंक को उसके वैध मॉर्गेज (बंधक) अधिकारों के प्रयोग से रोकने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी एक्सिस बैंक लिमिटेड बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग मामले में प्रथम दृष्टया आधार पर की। अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी/एसटी एक्ट का उद्देश्य सामाजिक न्याय और संरक्षण सुनिश्चित करना है, न कि बैंकिंग या वित्तीय विवादों में दखल देना। यह निर्णय न केवल बैंकों के लिए राहत का विषय बना, बल्कि यह भी रेखांकित किया कि संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं की सीमाओं का सम्मान आवश्यक है। जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस मामले में एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(एफ) और 3(1)(जी) लागू नहीं होतीं। अदालत के अनुसार, इन धाराओं का मकसद अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति की भूमि पर अवैध कब्जे या जबरन बेदखली से सुरक्षा प्रदान करना है, न कि बैंक को उसके वैध वित्तीय अधिकारों के प्रयोग से रोकना। कोर्ट ने एक्सिस बैंक, उसके एमडी और सीईओ के खिलाफ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा शुरू की गई कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी और मामले की अगली सुनवाई 5 फरवरी 2026 को निर्धारित की।
इस विवाद की जड़ तब पड़ी जब कंपनी ने ऋण चुकाने में असफलता दिखाई। बैंक ने 2017 में खाता एनपीए घोषित किया और वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (SARFAESI Act) के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग शुरू किया। इस प्रक्रिया में संपत्ति के स्वामित्व को लेकर सिविल विवाद उत्पन्न हुआ और एक पक्ष ने मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में दाखिल कर दिया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि बैंक ने एससी/एसटी समुदाय के व्यक्ति की भूमि पर कब्जा करने और उसे बेदखल करने का प्रयास किया, जो एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(एफ) और 3(1)(जी) का उल्लंघन है। इसके आधार पर आयोग ने एक्सिस बैंक के एमडी और सीईओ को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया।
बैंक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और दलील दी कि आयोग के पास ऐसे वाणिज्यिक विवादों में अधिकार क्षेत्र नहीं है। अदालत ने माना कि आयोग की कार्यवाही अधिकार क्षेत्र से बाहर प्रतीत होती है और बैंक अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब करने का कोई स्पष्ट कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने दोहराया कि प्रथम दृष्टया एससी/एसटी एक्ट की धाराओं का उपयोग बैंक के वैध मॉर्गेज अधिकारों के प्रयोग को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन धाराओं का उद्देश्य जातिगत उत्पीड़न या भेदभाव से सुरक्षा है, न कि वित्तीय या व्यावसायिक मामलों में दखल देना।






