
डेढ़ सौ वर्ष बाद भी ‘वंदे मातरम’ हर भारतीय के दिल में गूंजता है। यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम की सतत प्रेरणा है, जो हमें याद दिलाती है कि भारत की शक्ति उसकी एकता, संस्कृति और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा में निहित है।
1950 में संविधान सभा ने सर्वसम्मति से ‘वंदे मातरम’ को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, “वंदे मातरम ने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, इसे जन गण मन के समान सम्मान मिलेगा।”
केंद्र सरकार इस वर्ष देशभर में 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष कार्यक्रम आयोजित कर रही है। दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में राष्ट्रीय समारोह होगा, साथ ही डाक टिकट, स्मारक सिक्का और प्रदर्शनी जारी की जाएगी। देशभर के दूतावासों में “Vande Mataram: Salute to Mother Earth” थीम पर सांस्कृतिक आयोजन, वृक्षारोपण और भित्तिचित्र अभियान चलेंगे।
देशभर में आज ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया जा रहा है। 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अमर प्रतीक बन गया। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति भक्ति, एकता और आत्मगौरव की भावना का सजीव रूप है। आइए जानते हैं, कैसे बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित यह कविता भारत का राष्ट्रगीत बनी। 7 नवंबर 1875 को पहली बार ‘वंदे मातरम’ बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में इसे बंकिमचंद्र की प्रसिद्ध कृति ‘आनंदमठ’ में स्थान मिला। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को संगीतबद्ध किया और 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान यह गीत जनआंदोलन का नारा बन गया।
‘आनंदमठ’ में संन्यासियों का एक दल मातृभूमि की सेवा को ही अपना धर्म मानता है। उनके लिए ‘वंदे मातरम’ पूजा का प्रतीक है। उपन्यास में मां भारत को तीन रूपों में दर्शाया गया है, गौरवशाली अतीत, पीड़ित वर्तमान और पुनर्जागृत भविष्य। श्री अरविंदो ने लिखा था, यह मां भीख नहीं मांगती, बल्कि सत्तर करोड़ हाथों में तलवार लिए भारत माता का रूप है।
1838 में जन्मे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रचिंतक थे। उनकी रचनाएँ दुर्गेशनंदिनी, कपालकुंडला, देवी चौधरानी देशप्रेम और आत्मसम्मान की भावना से ओतप्रोत हैं। ‘वंदे मातरम’ के माध्यम से उन्होंने भारतीय जनमानस को मातृभूमि की आराधना का संदेश दिया।
आंदोलन का नारा बना ‘वंदे मातरम’
1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत स्वतंत्रता का घोषवाक्य बन गया। हर शहर में लोग ‘वंदे मातरम’ के जयघोष से ब्रिटिश शासन को ललकारने लगे। ब्रिटिश सरकार ने जब इसे स्कूलों में गाने पर रोक लगाई, तब भी छात्र-छात्राओं ने इसे गाना बंद नहीं किया। यह गीत हर भारतीय के हृदय की धड़कन बन गया। 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में भीकाजी कामा ने जब भारत का पहला तिरंगा फहराया, उस पर ‘वंदे मातरम’ अंकित था। मदनलाल धींगरा के अंतिम शब्द भी यही थे, “वंदे मातरम।” यह गीत विदेशों में भी स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।






