बीएमसी चुनाव: 20 साल बाद साथ आए ठाकरे बंधु, फिर भी मराठी वोटों को एकजुट करने का प्रयास विफल

मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों में 20 साल बाद बना उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन भाजपा–शिंदे गुट की ‘महायुति’ के सामने टिक नहीं सका। बाल ठाकरे की विरासत को बचाने और मराठी वोटों को एकजुट करने की कोशिश नाकाम रही। नतीजों में महायुति को बड़ी जीत मिली, जबकि ठाकरे भाइयों को करारी हार का सामना करना पड़ा।

देश की सबसे अमीर नगर निगम के चुनावों पर पूरे देश की नजरें थीं। 20 वर्षों बाद एकजुट हुए चचेरे भाई उद्धव और राज ठाकरे ने मराठी वोटों के बिखराव को रोकने और बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को एकनाथ शिंदे से वापस लेने के उद्देश्य से हाथ मिलाया था, लेकिन यह रणनीति कारगर साबित नहीं हुई। भाजपा–शिंदे गुट की महायुति ने कुल 118 सीटें जीतकर बीएमसी में बहुमत के आंकड़े से चार सीटें अधिक हासिल कीं। इसके उलट, शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस का गठबंधन अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन करता दिखा। शुक्रवार को आए नतीजों ने साफ कर दिया कि ठाकरे परिवार की एकजुटता चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकी। राज ठाकरे की गैर-महाराष्ट्रियों के प्रति सख्त लाइन और मराठी अस्मिता के आक्रामक प्रचार का असर शिवसेना (यूबीटी) पर पड़ा। खासतौर पर गैर-मराठी बहुल वार्डों में पार्टी को नुकसान झेलना पड़ा। इसी आधार पर राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि उद्धव ठाकरे के लिए एमएनएस के बजाय अकेले या कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ना अधिक लाभकारी हो सकता था, कांग्रेस ने 11 वार्डों में जीत दर्ज की है।

एनसीपी (एसपी) का खाता नहीं खुला
शरद पवार की एनसीपी (एसपी), जो शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के साथ गठबंधन में थी, एक भी सीट नहीं जीत सकी। हालांकि, यह कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि महा विकास अघाड़ी, कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) एकजुट होकर चुनाव लड़ती, तो परिणाम अलग हो सकते थे। कुल मिलाकर, बीएमसी चुनावों ने संकेत दिया है कि पारिवारिक या भावनात्मक एकजुटता से अधिक निर्णायक कारक राजनीतिक रणनीति, गठबंधन संतुलन और व्यापक मतदाता आधार होता है। महायुति की जीत ने महाराष्ट्र की सियासत में नए समीकरणों को रेखांकित किया है।

विशिखा मीडिया

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