
गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले से प्रेरित हुए लोग
गाजियाबाद के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद यह मुद्दा देशभर में चर्चा का केंद्र बन गया है। उनके मामले से प्रेरित होकर अब तक 75 लोगों ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में इच्छामृत्यु के लिए आवेदन कर दिया है, जिससे प्रशासन के सामने एक नई चुनौती उभरकर सामने आई है।
हरीश राणा, जो गाजियाबाद के निवासी थे, को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। अदालत के निर्देशानुसार दिल्ली के एम्स में यूथेनेशिया की प्रक्रिया पूरी की गई। इस घटना ने पूरे देश में व्यापक बहस को जन्म दिया। अब इसी से प्रेरित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने बीएमसी के समक्ष इच्छामृत्यु के लिए आवेदन प्रस्तुत किए हैं। इन आवेदनों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यदि भविष्य में आवेदक किसी गंभीर बीमारी या दुर्घटना के कारण कोमा जैसी स्थिति में पहुंच जाते हैं और उनके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं रहती, तो उन्हें भी हरीश राणा की तरह इच्छामृत्यु का विकल्प प्रदान किया जाए। इसके लिए आवेदकों ने विधिवत ‘लिविंग विल’ तैयार कर उसे नोटरी से प्रमाणित कराकर संबंधित अधिकारियों के पास जमा किया है। इस मुद्दे पर मुंबई की मेयर रितु तावड़े ने कहा कि बीएमसी की भूमिका केवल ऐसे आवेदनों को सुरक्षित रखने तक सीमित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इच्छामृत्यु को लागू करने का अधिकार नगर निगम के पास नहीं होता, बल्कि यह निर्णय परिवार और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दिए जाने के बाद बीएमसी ने प्रत्येक वार्ड में मेडिकल अधिकारियों को ‘लिविंग विल’ से जुड़े दस्तावेजों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी है। इच्छुक व्यक्ति को नोटरीकृत ‘लिविंग विल’ तैयार कर अपने वार्ड कार्यालय में जमा करना होता है, जहां इसे आधिकारिक रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित रखा जाता है।
बीएमसी को अब तक कुल 75 आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। प्रक्रिया को और अधिक सरल और सुगम बनाने के लिए राज्य सरकार एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल या मोबाइल ऐप विकसित करने पर काम कर रही है, जिससे लोग घर बैठे ही आवेदन कर सकें। हरीश राणा के निधन के बाद आवेदनों में यह तेजी देखने को मिली है। 31 वर्षीय राणा, जिन्हें लंबे समय से पेलिएटिव केयर मिल रही थी, भारत में कानूनी रूप से इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले पहले व्यक्ति बने। उनके इस ऐतिहासिक मामले ने देश में ‘लिविंग विल’ और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।






