महाराष्ट्र: नाराज़गी, और संघर्ष के बाद शपथ; छगन भुजबल की सरकार में वापसी

फडणवीस सरकार को आगामी स्थानीय और नगर निकाय चुनावों के मद्देनज़र एक प्रभावशाली ओबीसी चेहरे की आवश्यकता थी, खासकर तब जब ओबीसी नेता धनंजय मुंडे को सरपंच संतोष देशमुख की हत्या के मामले में मंत्री पद छोड़ना पड़ा था।

मुंबई – राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता और विधायक छगन भुजबल ने मंगलवार को राज्यपाल के समक्ष महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद गठित महायुति सरकार में उन्हें पहले जगह नहीं मिली थी, लेकिन छह महीने बाद अब उनकी मंत्रिमंडल में फिर से वापसी हुई है। नाशिक के येवला से विधायक भुजबल ओबीसी समुदाय के एक मजबूत स्तंभ माने जाते हैं। मुंडे के इस्तीफे से खाली हुए मंत्रालय के कारण अब भुजबल को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की ज़िम्मेदारी मिलने की संभावना है, एक विभाग जिसे वे पहले भी संभाल चुके हैं। मंत्री पद न मिलने से भुजबल नाराज़ हो गए थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाखुशी ज़ाहिर की थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि विधानसभा चुनाव में ओबीसी मुद्दों को उठाने के बावजूद उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया। इसके चलते वे पार्टी गतिविधियों से दूरी बना चुके थे, हालांकि अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल के हस्तक्षेप के बाद वे दोबारा सक्रिय हुए। राज्यसभा सीटों के लिए नाम पर विचार न होने से भी उनकी नाराज़गी बढ़ी थी। ओबीसी समुदाय में भुजबल की गहरी पकड़ को देखते हुए और मुंडे के इस्तीफे के बाद उपजे खालीपन को भरने के लिए एनसीपी को उनके जैसे दमदार चेहरे की ज़रूरत थी। मुंडे के जाने के बाद उनका विभाग उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने संभाला था।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को चार महीने में स्थानीय निकाय चुनाव कराने का निर्देश दिया है, ऐसे में भुजबल की मंत्रिमंडल में वापसी एनसीपी के लिए रणनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है। ओबीसी आरक्षण की सुरक्षा के मुद्दे पर वे शुरू से ही मुखर रहे हैं और मराठा आरक्षण के विरोध में संघर्ष कर चुके हैं। वे जातिगत जनगणना के भी प्रबल समर्थक रहे हैं, जिसे हाल ही में केंद्र सरकार ने मंजूरी दी है।

छगन भुजबल का सियासी सफर बेहद दिलचस्प
शिवसेना के गठन से ही राजनीति में सक्रिय भुजबल पहले मुंबई महानगरपालिका में नगरसेवक बने और बाद में मुंबई के मेयर भी रहे। बालासाहेब ठाकरे से मतभेद के चलते उन्होंने 1991 में शिवसेना छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया। फिर 1999 में वे शरद पवार की एनसीपी में शामिल हो गए। 2008 से 2010 तक वे राज्य के उपमुख्यमंत्री भी रहे।
2016 में उन्हें महाराष्ट्र सदन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार किया गया, लेकिन जेल से रिहा होने के बाद एनसीपी ने उन्हें फिर से सक्रिय राजनीति में स्थान दिया और 2019 की महा विकास आघाड़ी सरकार में उन्हें मंत्री बनाया। 2023 में एनसीपी में हुए विभाजन के बाद उन्होंने शरद पवार का साथ छोड़ अजित पवार का समर्थन किया।

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