चंडीगढ़: बीजेपी के सौरभ जोशी बने मेयर, हारते-हारते पलट गई बाजी

43 वर्षीय सौरभ जोशी पेशे से अधिवक्ता हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से की। वर्तमान में वे चंडीगढ़ बीजेपी के प्रमुख और प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। वे वार्ड नंबर 12 (सेक्टर 15, 16, 17 और 24) का प्रतिनिधित्व करते हैं।

चंडीगढ़ नगर निगम मेयर चुनाव में बीजेपी ने जोरदार वापसी करते हुए सौरभ जोशी को मेयर चुना। त्रिकोणीय मुकाबले में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच वोटों के बंटवारे का फायदा बीजेपी को मिला। जोशी को कुल 18 वोट प्राप्त हुए, जबकि आप उम्मीदवार योगेश ढींगरा को 11 और कांग्रेस के गुरप्रीत सिंह गाबी को 7 वोट मिले। शुरुआती आंकड़ों में बीजेपी कमजोर दिख रही थी, लेकिन रणनीतिक परिस्थितियों और विपक्षी वोट विभाजन ने पूरा समीकरण बदल दिया। यह जीत बीजेपी के लिए किसी मास्टरस्ट्रोक से कम नहीं रही।

त्रिकोणीय मुकाबले में बदला खेल
इस चुनाव में कुल 36 पार्षदों ने मतदान किया। वर्ष 1996 के बाद पहली बार गुप्त मतदान के बजाय हाथ उठाकर सार्वजनिक मतदान कराया गया, जो नई एसओपी के तहत पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए अपनाया गया कदम था। बीजेपी के पास मूल रूप से 14 पार्षद थे, जबकि आप के 13 और कांग्रेस के 7 पार्षद थे। आप और कांग्रेस के बीच किसी तरह का गठबंधन न होने के कारण उनके वोट बंट गए और इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिला। शुरुआत में आम आदमी पार्टी मजबूत स्थिति में नजर आ रही थी, लेकिन कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से तस्वीर पलट गई। जीत के बाद सौरभ जोशी ने भावुक होते हुए कहा कि यह जनता की जीत है और वे शहर के विकास के लिए पूरी तरह समर्पित रहेंगे।

सौरभ जोशी का राजनीतिक प्रोफाइल
सौरभ जोशी का ताल्लुक एक राजनीतिक परिवार से है। उनके पिता जय राम जोशी 1990 के दशक में चंडीगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं, जबकि उनके भाई विनीत जोशी भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। सौरभ जोशी नगर निगम में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं और कचरा प्रबंधन, पार्किंग व्यवस्था और शहर के सौंदर्यीकरण जैसे मुद्दों पर लगातार काम किया है। मेयर बनने के बाद उन्होंने अपने पिता की तस्वीर थामकर यह सफलता उन्हें समर्पित की। उनके एजेंडे में शहर की स्वच्छता रैंकिंग सुधारना, नगर निगम की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना और चंडीगढ़ को और सुंदर बनाना प्रमुख रूप से शामिल है। वे खुद को ‘जनता का सेवक’ मानते हैं और संख्याबल से अधिक जनहित को प्राथमिकता देने की बात कहते हैं।

आप-कांग्रेस को क्यों मिली हार
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन न होने के कारण विपक्षी वोट बंट गए। आप के उम्मीदवार योगेश ढींगरा को मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन वे 11 वोटों तक ही सीमित रह गए। कांग्रेस के गुरप्रीत सिंह गाबी को 7 वोट मिले। चुनाव के दौरान विपक्ष की ओर से आरोप-प्रत्यारोप जरूर लगे, लेकिन कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया। बीजेपी ने इस जीत को पारदर्शी प्रक्रिया का परिणाम बताया।

बीजेपी के लिए संजीवनी साबित हुई जीत
यह जीत बीजेपी के लिए मनोबल बढ़ाने वाली मानी जा रही है, खासकर लोकसभा चुनाव से पहले। चंडीगढ़ की राजनीति में इससे नए समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। सौरभ जोशी ने भरोसा जताया कि वे शहर को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे। वहीं विपक्ष ने हार स्वीकार करते हुए भविष्य में एकजुट रणनीति की जरूरत पर जोर दिया। कुल मिलाकर, बीजेपी की रणनीति ने लगभग हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया।

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