यूपी में कांग्रेस के सूखे की जड़ में गांधी परिवार की बेरूखी

उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने लम्बे समय के बाद लखनऊ में मनरेगा के नियमों में बदलाव के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाया। कांग्रेस मनरेगा को अपना मास्टरस्ट्रोक समझती रही है। इसी लिये मोदी सरकार ने जब श्रमिकों के लिये कांग्रेस सरकार में लाये गये मनरेगा कानून को बदलक जी राम जी किया तो कांग्रेस आग बबूला हो गई। इसको लेकर कांग्रेस और गांधी परिवार मोदी सरकार पर हमलावर हो गई,लेकिन कांग्रेस का आंदोलन थोथा साबित हुआ। कांग्रेस के किसी केन्द्रीय नेता ने हिस्सा नहीं लियात तो प्रदेश के कांग्रेसी नेताअेों ने भी फोटोशूट करके अपने कर्तव्य की आहूति दे दी। आश्चर्य की बात है कि चार दशक से यूपी की सत्ता से बाहर कांग्रेस अभी तक यह समझ नहीं पाई है कि प्रदेश की राजनीति का मैदान हमेशा से ही तलवारों की टक्कर का अखाड़ा रहा है। यहां सत्ता का रथ वही चला पाता है जो जनता की नब्ज को पकड़ ले और जमीन पर मजबूत जड़ें जमा ले। लेकिन पिछले 40 बरसों से कांग्रेस इस मैदान से बाहर खड़ी सिसक रही है। कभी इस सूबे के रास्ते ही पूरे देश पर राज करने वाली यह पार्टी आज अपनी पहचान बचाने को छटपटा रही है। बीते दस वर्षो की ही बात कि जाये तो 2017 के विधानसभा चुनाव से लेकर अब 2027 की आहट तक कांग्रेस ने जो खेल खेला, वह नाकामी की इबारत बन गया। न रणनीति बनी, न जमीन पर उतरी, बस सहारे तलाशते रहे। गांधी परिवार की दूरी ने तो जैसे अंतिम कील ठोक दी। आइए इस दस साल के पतन की पूरी दास्तान को जोड़कर देखें।

2017 के चुनाव कांग्रेस के लिए उम्मीदों का इंद्रधनुष थे। राहुल गांधी ने जोरशोर से प्रचार संभाला। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन हुआ। नारा गूंजा- दो लड़कों की जोड़ी। अखिलेश यादव और राहुल गांधी को युवा जोड़ी के रूप में पेश किया गया। कांग्रेस ने खुद को समाजवादी पार्टी का सहयोगी बनाया। लेकिन यह गठबंधन जमीन पर न चला। समाजवादी पार्टी का परंपरागत वोट बैंक मुस्लिम और पिछड़े वर्गों से था, लेकिन हिंदू मतदाता भाजपा की ओर खिंचे चले गए। राम मंदिर का मुद्दा, विकास का वादा और नरेंद्र मोदी की लहर ने कांग्रेस-सपा गठबंधन को धराशायी कर दिया। नतीजा? भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें जीतीं। कांग्रेस को महज सात विधायक मिले। राहुल गांधी ने यूपी से नाता तोड़ लिया। उसके बाद वे दुबारा लौटे ही नहीं। परिवार ने सूबे को भुला दिया।इस हार ने कांग्रेस को झकझोर दिया। लेकिन सबक लेने के बजाय वे फिर सहारों की तलाश में भटकने लगे। 2019 के लोकसभा चुनाव आए। कांग्रेस ने फिर गठबंधन की राह पकड़ी। इस बार पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोक दल के साथ हाथ मिलाया। पूर्वी यूपी में अपना उत्साह जुटाया। लेकिन नतीजे शर्मनाक रहे। पूरे सूबे में 80 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस सिर्फ दो पर सिमट गई। रायबरेली से राहुल गांधी और अमेठी से स्मृति ईरानी के खिलाफ किशोरी लाल शर्मा जीते। अमेठी की हार ने तो जैसे कांग्रेस का घमंड तोड़ दिया। राहुल गांधी अमेठी छोड़कर रायबरेली चले गए। सूबे में विधायकों की तादाद उंगलियों पर गिनी जाने लायक रह गई। जनाधार? वह तो 1980 के दशक से ही खिसक चुका था। ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम- सबके वोट बंट चुके थे। भाजपा ने संगठन खड़ा कर लिया था, सपा-बसपा अपनी-अपनी पूरानी जमीन पर कायम थे। कांग्रेस के पास न नेता थे, न मुद्दे।

2020 आया। महामारी ने सबको लाक किया। लेकिन राजनीति रुकी नहीं। कांग्रेस ने संगठन को जगाने की कोशिश की। प्रियंका वाड्रा को महासचिव बनाया गया। वे लखनऊ में घर ले आईं। लेकिन जमीन पर उतरना मुश्किल था। किसान आंदोलन चला। दिल्ली की सीमाओं पर धरने हुए। कांग्रेस ने समर्थन दिया। लेकिन यूपी के किसानों का गुस्सा भाजपा पर था, कांग्रेस को फायदा न हुआ। उल्टा आंदोलन के दौरान हिंसा ने कांग्रेस की छवि खराब की। प्रियंका वाड्रा ने लखनऊ से सक्रियता दिखाई। मीटिंगें कीं, वादे किए। लेकिन स्थानीय नेता कमजोर पड़ गए। अजय कुमार लल्लू जैसे नेताओं ने कोशिश की, पर संगठन जर्जर था।फिर आया 2022 का विधानसभा चुनाव। यह कांग्रेस का अंतिम मौका था। प्रियंका वाड्रा ने नारा दिया- लड़की हूं, लड़ सकती हूं। उन्होंने 100 से ज्यादा सीटों पर महिलाओं को टिकट दिए। लखनऊ में घर से प्रचार संभाला। राहुल गांधी भी कुछ रैलियां कीं। लेकिन गठबंधन का अभाव महंगा पड़ा। सपा ने अकेले चुनाव लड़ा। बसपा ने अपनी राह पकड़ी। भाजपा ने योगी आदित्यनाथ की लहर पर सवार होकर फिर भारी जीत हासिल की। कांग्रेस को दो विधायक ही मिले। प्रियंका वाड्रा की मेहनत रंग न लाई। मतदाताओं ने भरोसा न किया। क्यों? क्योंकि कांग्रेस के पास न स्थानीय चेहरा था, न मुद्दा। महंगाई, बेरोजगारी पर बोलते, लेकिन जनता को याद आता 1989 के बाद का सूखा। गांधी परिवार सूबे से दूर था। राहुल दिल्ली में थे, प्रियंका लखनऊ में रहकर भी संगठन न जगा पाईं। हार के बाद कांग्रेस फिर अनाथ हो गई। नेता घरों में कैद, कार्यकर्ता निराश।

2024 के लोकसभा चुनाव ने घाव पर नमक छिड़का। प्रियंका वाड्रा ने राहुल गांधी के वायनाड जाने पर यूपी फोकस किया। लेकिन नतीजे निराशाजनक। यूपी में कांग्रेस को सात लोकसभा सीटें मिलीं। इंडिया गठबंधन में सपा के साथ हाथ मिलाया। सपा ने कांग्रेस को 17 सीटें दीं। नतीजा? कांग्रेस ने सभी सात जीतीं। लेकिन यह सपा की लहर थी। कांग्रेस का अपना वोट न बढ़ा। रायबरेली और अमेठी सुरक्षित रहे। बाकी जीत सपा के समर्थन से। गांधी परिवार ने फिर दूरी बनाई। राहुल वायनाड चले गए। प्रियंका सक्रिय न रहीं। सूबे में संगठन सोया रहा। अब 2027 की आहट है। योगी सरकार मजबूत। सपा-बसपा अपनी चाल चला रही। कांग्रेस? फिर सहारा तलाश रही। गठबंधन की बातें हो रही, लेकिन जनाधार नदारद।पिछले दस सालों का विश्लेषण बताता है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल रणनीति का अभाव है। गठबंधनों पर निर्भरता बढ़ी। 2017 में सपा, 2019 में रालोद, 2024 में सपा। लेकिन खुद की ताकत न बनी। गांधी परिवार ने यूपी को प्राथमिकता न दी। राहुल 2017 के बाद गायब। प्रियंका 2022 तक आईं, फिर पीछे हट गईं। स्थानीय नेतृत्व कमजोर। कोई बड़ा चेहरा न उभरा। जनाधार खिसका क्योंकि मुद्दे पुराने। राम मंदिर पर चुप्पी, हिंदुत्व पर पीछे। विकास, रोजगार पर बोलना, लेकिन संगठन न होने से असर न हुआ। कार्यकर्ता भाजपा-सपा में चले गए। युवा न जुड़े। परिणामस्वरूप आज कांग्रेस हाशिए पर है। दो सांसद, मुट्ठी भर विधायक। 2027 में वापसी? मुश्किल। बिना परिवार के लौटने, संगठन निर्माण और मुद्दों पर जोर के बिना नामुमकिन। यूपी की राजनीति सिखाती है, जमीन खो दी तो सत्ता का स्वाद भूल जाना पड़ता है। कांग्रेस को अब जड़ें मजबूत करनी होंगी, वरना यह छटपटाहट जारी रहेगी।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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