रिव्यू: फिल्म ‘सूबेदार’

कलाकार: अनिल कपूर, राधिका मदान, सौरभ शुक्ला, आदित्य रावल, मोना सिंह, फैसल मलिक और खुशबू सुंदर
लेखक: सुरेश त्रिवेणी और प्रज्जवल चंद्रशेखर
निर्देशक: सुरेश त्रिवेणी
निर्माता: विक्रम मल्होत्रा, अनिल कपूर और सुरेश त्रिवेणी
रिलीज: 5 मार्च 2026
रेटिंग: 2/5 ⭐

ओटीटी प्लेटफॉर्म एमेज़ोन प्राइम वीडियो पर अनिल कपूर की नई फिल्म ‘सूबेदार’ रिलीज हो गई है। 69 वर्ष की उम्र में भी अनिल कपूर फिल्म में जबरदस्त एक्शन करते नजर आते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ उनके दम पर यह फिल्म देखने लायक बन पाती है?

‘दलदल’ और ‘द ब्लफ’ के बाद एक बार फिर प्राइम वीडियो अपने दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहा है। इस बार मंच पर है अनिल कपूर की फिल्म ‘सूबेदार’, जो लगभग पूरी तरह उन्हीं के कंधों पर टिकी दिखाई देती है। फिल्म में बाकी किरदार मौजूद तो हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल काफी सतही लगता है। खलनायक बेहद खतरनाक दिखाए गए हैं, लेकिन उनकी गतिविधियां उतनी प्रभावी नहीं दिखतीं और कई बार सिर्फ फिल्म की अवधि बढ़ाने का काम करती हैं।

करीब ढाई घंटे लंबी यह फिल्म सूबेदार अर्जुन मौर्य (अनिल कपूर) की कहानी है। अर्जुन अपनी बेटी श्यामा (राधिका मदान) के साथ रहते हैं। उनकी पत्नी (खुशबू सुंदर) की एक दुर्घटना में मौत हो चुकी है। बेटी के मन में यह शिकायत है कि जब उसकी मां का निधन हुआ, तब उसके पिता घर पर मौजूद नहीं थे। जिस शहर में अर्जुन रहते हैं, वहां बबली दीदी (मोना सिंह) का दबदबा है। बबली अवैध रेत खनन के कारोबार से जुड़ी हुई है और उसके कई घाटों पर उसका नियंत्रण है। जो भी उसके गैरकानूनी कामों के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है। बबली भले ही जेल में हो, लेकिन उसका भाई प्रिंस (आदित्य रावल) बाहर उसकी सत्ता को आगे बढ़ा रहा है। इस पूरे नेटवर्क को ‘साफ्टी भैया’ संभालते हैं। सरहद पर लंबी सेवा देने के बाद अर्जुन जब रिटायर होकर घर लौटते हैं, तो उनके दोस्त प्रभाकर (सौरभ शुक्ला) उन्हें प्रिंस का ड्राइवर बनवा देते हैं। यहीं से कहानी में असली टकराव शुरू होता है। अर्जुन को सामान्य जीवन जीने के लिए भी भ्रष्टाचार और अपराधियों से भिड़ना पड़ता है। एक रिटायर्ड सूबेदार कैसे अपने सम्मान और बेटी की सुरक्षा के लिए इन ताकतों से मुकाबला करता है, फिल्म का मूल कथानक यही है।

फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं अनिल कपूर और सौरभ शुक्ला। इस उम्र में अनिल कपूर को एक्शन करते देखना दर्शकों को उत्साहित करता है। उनके कई एक्शन सीन अच्छी तरह डिजाइन किए गए हैं और यही फिल्म की मुख्य यूएसपी भी हैं। सौरभ शुक्ला का किरदार छोटा जरूर है, लेकिन वे अपने अभिनय से कहानी में जान डालते हैं। बुंदेलखंडी लहजे को भी उन्होंने काफी स्वाभाविक तरीके से निभाया है, हालांकि उन्हें और स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था। फिल्म की गति काफी धीमी है। शुरुआती करीब 40 मिनट सिर्फ कहानी की पृष्ठभूमि बनाने में निकल जाते हैं। जिन किरदारों को बेहद ताकतवर दिखाया गया है, वे वही पुराने घिसे-पिटे तरीके अपनाते नजर आते हैं जो कई वेब सीरीज और फिल्मों में पहले भी देखे जा चुके हैं। खलनायकों को क्रूर दिखाने के लिए कुछ अनावश्यक हत्याओं और दिखावटी दृश्यों का सहारा लिया गया है, लेकिन उनका प्रभाव सीमित ही रहता है।

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी कमजोर राइटिंग है। कई जगह ऐसा लगता है कि कहानी को पहले वेब सीरीज के रूप में तैयार किया गया होगा और बाद में फिल्म का रूप दे दिया गया। क्लाइमैक्स भी खास प्रभाव नहीं छोड़ता और अगले पार्ट के संकेत भी खास आकर्षक नहीं लगते। अभिनय की बात करें तो राधिका मदान बेटी के किरदार में ठीक लगती हैं और कुछ एक्शन दृश्यों में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है। आदित्य रावल को फिल्म में मुख्य खलनायक का बड़ा मौका मिला था, लेकिन वे इस किरदार को पूरी तरह प्रभावशाली नहीं बना पाए। उनका अभिनय कई जगह फीका लगता है। मोना सिंह माफिया बॉस के रूप में भी खास प्रभाव नहीं छोड़ पातीं और सीमित दृश्यों में ही नजर आती हैं। वहीं फैसल मलिक जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता का उपयोग भी फिल्म में सही तरीके से नहीं किया गया।

निर्देशक सुरेश त्रिवेणी का निर्देशन भी फिल्म को मजबूत नहीं बना पाता। कहानी की गति धीमी है और लंबाई जरूरत से ज्यादा महसूस होती है। इतनी बड़ी माफिया ताकत के सामने एक अकेले सूबेदार का संघर्ष दिखाया गया है, लेकिन फिल्म में वह डर या तनाव पैदा नहीं हो पाता जिसकी ऐसी कहानी से उम्मीद की जाती है। अगर आप अनिल कपूर के बड़े प्रशंसक हैं और क्राइम-एक्शन फिल्में पसंद करते हैं तो इसे एक बार देख सकते हैं। हालांकि कमजोर पटकथा और धीमी रफ्तार की वजह से यह फिल्म कई जगह निराश करती है।

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