
50 वर्षों में पहली बार देश के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं
केरल में पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार की हार के साथ ही भारत में वामपंथी राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया है। 1977 के बाद यह पहली बार है जब देश के किसी भी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं बची है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद अब केरल, जो वामपंथ का अंतिम मजबूत गढ़ माना जाता था, वह भी उनके हाथ से निकल गया है। एक समय देश के तीन प्रमुख राज्यों केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वामपंथी दलों का प्रभावी शासन था। इन राज्यों में न केवल उनकी सरकारें थीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व भी कायम था हालांकि, समय के साथ यह आधार कमजोर होता गया और अब स्थिति यह है कि देश में कहीं भी वामपंथी सरकार नहीं रही। वैश्विक स्तर पर भी वामपंथी विचारधारा का प्रभाव सीमित होता जा रहा है। रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे कुछ ही देशों में वामपंथी शासन बचा है, जबकि चीन में कम्युनिस्ट सरकार होने के बावजूद उसकी नीतियों में पूंजीवादी झुकाव स्पष्ट दिखाई देता है।
केरल: 1957 में बनी थी पहली वाम सरकार
केरल में 1957 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनाई थी। यह विश्व की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई वामपंथी सरकार मानी जाती है। राज्य की राजनीति में लंबे समय से एलडीएफ (माकपा नेतृत्व) और यूडीएफ (कांग्रेस नेतृत्व) के बीच सत्ता का अदल-बदल होता रहा है। पिछले एक दशक से एलडीएफ सत्ता में थी और उसे तीसरी बार जीत की उम्मीद थी, लेकिन यूडीएफ ने उसे पराजित कर सत्ता अपने नाम कर ली।
पश्चिम बंगाल: 34 वर्षों तक रहा वामपंथ का दबदबा
पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक वाम दलों का लगातार शासन रहा। ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में यह देश का सबसे लंबा वामपंथी शासन रहा। हालांकि, औद्योगीकरण की नीतियों और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों के चलते वाम दलों का जनाधार कमजोर हुआ और 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने उनकी सत्ता समाप्त कर दी।
त्रिपुरा: 2018 में खत्म हुआ वाम शासन
त्रिपुरा में भी 1977 में पहली वाम सरकार बनी थी और माणिक सरकार के नेतृत्व में यह लंबे समय तक सत्ता में रही। लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी-आईपीएफटी गठबंधन ने वाम दलों को सत्ता से बाहर कर दिया। वेतन आयोग और विकास से जुड़े मुद्दों ने भी वाम सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में भूमिका निभाई।
भाकपा का विभाजन और माकपा का गठन
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ, जिसके बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का गठन हुआ। इसके बाद वाम राजनीति दो धाराओं में बंट गई, लेकिन कई राज्यों में उनका प्रभाव बना रहा।
कुल मिलाकर, केरल में हालिया राजनीतिक बदलाव के साथ भारत में वामपंथी दलों का सत्ताधारी दौर पूरी तरह समाप्त हो गया है, जो देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है।






