हिमाचल: प्रदेश के हर जिले में बनेंगे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड

प्रदेश में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) नियम-2026 लागू

हिमाचल प्रदेश में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) नियम-2026 लागू कर दिए गए हैं। इन नए प्रावधानों के तहत अब हर जिले में एक या उससे अधिक जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड गठित किए जाएंगे। प्रत्येक बोर्ड में एक न्यायिक अधिकारी और दो सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य होंगे, जिनमें एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य रहेगा। बच्चों के अधिकारों और संरक्षण को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने ये नियम लागू किए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों के लिए न्यूनतम 7 वर्ष का अनुभव और आयु सीमा 35 से 65 वर्ष निर्धारित की गई है। सोमवार को राजपत्र में जारी अधिसूचना के अनुसार, बोर्ड की कार्यवाही पारंपरिक अदालतों की तरह नहीं होगी, बल्कि पूरी प्रक्रिया को बाल-अनुकूल वातावरण में संचालित किया जाएगा। सुनवाई के दौरान बच्चों के सामने कोई अवरोध या ऊंचा मंच नहीं होगा और संवाद में भाषा, व्यवहार व हावभाव पूरी तरह संवेदनशील रखे जाएंगे, ताकि बच्चों पर मानसिक दबाव न पड़े। जरूरत पड़ने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी सुनवाई संभव होगी। आपात स्थिति में अवकाश के दिनों में भी बोर्ड का एक सदस्य उपलब्ध रहेगा।

सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों को प्रत्येक बैठक के लिए न्यूनतम 2000 रुपये का मानदेय दिया जाएगा, जबकि अनुवादक और विशेष शिक्षकों को प्रतिदिन 1500 रुपये तक का भुगतान किया जाएगा। इन सभी व्ययों का वहन स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसाइटी या जुवेनाइल जस्टिस फंड द्वारा किया जाएगा। नियमों में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी कारणवश कोई बच्चा स्कूल से बाहर हो गया है, तो बोर्ड उसे पुनः शिक्षा से जोड़ने के लिए आवश्यक निर्देश दे सकेगा। प्रत्येक बच्चे की प्रगति की निगरानी के लिए रिहैबिलिटेशन कार्ड जारी किया जाएगा। इसके अलावा, बोर्ड परिसरों और बाल देखभाल संस्थानों में सुझाव एवं शिकायत पेटियां स्थापित की जाएंगी और एक ऑनलाइन शिकायत प्रणाली भी विकसित की जाएगी।

बोर्ड द्वारा चाइल्ड केयर संस्थानों का नियमित निरीक्षण किया जाएगा तथा प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से समन्वय किया जाएगा। आवश्यकतानुसार स्वयंसेवी संस्थाओं और एनजीओ का सहयोग भी लिया जाएगा। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, इन नए नियमों के लागू होने से राज्य की किशोर न्याय प्रणाली अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और बाल-केंद्रित बनेगी। विशेष रूप से बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और मानसिक सुरक्षा पर दिया गया जोर एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।

विशिखा मीडिया

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