नीदरलैंड्स में डच पीएम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपी 30 किलो की मुहर और 21 तांबे की प्लेटें
11वीं सदी का वो शाही खजाना, जिसे फिरंगियों ने 300 साल पहले भारत से लूटा था, आखिरकार वतन वापस आ गया है।
लगभग तीन शताब्दियों पहले औपनिवेशिक दौर में विदेश ले जाया गया चोल साम्राज्य का बेशकीमती शाही खजाना अब भारत लौट आया है। नीदरलैंड्स में आयोजित एक उच्चस्तरीय समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में इन ऐतिहासिक ताम्रपत्रों को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। 11वीं शताब्दी के इन 21 ताम्रपत्रों पर चोल वंश की शाही मुहर अंकित है, जिनमें संस्कृत और तमिल भाषाओं में महान शासक राजा राजा चोल प्रथम के आदेश दर्ज हैं। वर्ष 2012 से जारी कानूनी प्रयासों के बाद इन धरोहरों की वापसी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।

300 साल बाद स्वदेश लौटी ऐतिहासिक धरोहर
नीदरलैंड्स से 11वीं सदी के इन बहुमूल्य ‘चोल ताम्रपत्रों’ की वापसी भारत की सांस्कृतिक और कूटनीतिक शक्ति का प्रतीक बनकर उभरी है। शनिवार को आयोजित एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम में इन अमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेजों को भारत को सौंपा गया। इस अवसर पर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी ने इस क्षण को और भी ऐतिहासिक बना दिया। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत अब वैश्विक स्तर पर अपनी लूटी गई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने में लगातार सफल हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने बहु-देशीय दौरे के तहत संयुक्त अरब अमीरात से नीदरलैंड्स पहुंचे थे। इस दौरे में स्वीडन, नॉर्वे और इटली भी शामिल हैं। ताम्रपत्रों के हस्तांतरण का यह आयोजन भारत और नीदरलैंड्स के बीच मजबूत होते रणनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है।

30 किलो वजनी ताम्रपत्र और शाही मुहर
करीब 30 किलोग्राम वजनी इन 21 तांबे की प्लेटों को एक विशाल कांस्य रिंग के माध्यम से जोड़ा गया है, जिस पर चोल साम्राज्य की आधिकारिक मुहर अंकित है। इन्हें नीदरलैंड्स में ‘लेडेन प्लेट्स’ और भारत में ‘अनाइमंगलम कॉपर प्लेट्स’ के नाम से जाना जाता है। यह चोल वंश का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेख माना जाता है, जो भारत की सीमाओं के बाहर सुरक्षित था। इन अभिलेखों में तत्कालीन शासन व्यवस्था के उदार और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि एक हिंदू सम्राट राजा राजा चोल प्रथम ने एक बौद्ध मठ के संचालन के लिए राजस्व अनुदान को स्वीकृति दी थी। इन ताम्रपत्रों में संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं में विस्तृत विवरण दर्ज है, जो उस समय की प्रशासनिक प्रणाली और सांस्कृतिक समन्वय को दर्शाता है।

हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण
इस ऐतिहासिक सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुशी व्यक्त करते हुए इसे देशवासियों के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि 11वीं शताब्दी की यह अमूल्य धरोहर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है। इन ताम्रपत्रों की कलात्मकता और ऐतिहासिक महत्व की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि यह 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टियों का समूह है, जिनमें प्राचीन तमिल और संस्कृत में महत्वपूर्ण अभिलेख अंकित हैं। ये ताम्रपत्र महान शासक राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा अपने पिता राजा राजा चोल प्रथम के मौखिक वचन को स्थायी रूप देने से जुड़े हैं। इनमें चोल साम्राज्य की प्रशासनिक दक्षता, सांस्कृतिक समृद्धि और समुद्री शक्ति की झलक मिलती है, जिस पर आज भी देश को गर्व है।
रोचक इतिहास और यूरोप तक पहुंचने की कहानी
इन ताम्रपत्रों के निर्माण की कहानी भी अत्यंत दिलचस्प है। प्रारंभ में राजा राजा चोल प्रथम ने केवल मौखिक आदेश दिया था, जिसे ताड़ के पत्तों पर लिखा गया। बाद में उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने इस आदेश को स्थायी रूप देने के लिए तांबे की प्लेटों पर खुदवाने का निर्णय लिया, ताकि यह आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके। इन ऐतिहासिक धरोहरों के यूरोप पहुंचने की कहानी 18वीं सदी से जुड़ी है, जब फ्लोरेंटियस कैंपर नामक एक ईसाई मिशनरी इन्हें अपने साथ नीदरलैंड्स ले गया। उस समय नागापट्टिनम क्षेत्र डच औपनिवेशिक नियंत्रण में था।
अब, सदियों बाद, इन ताम्रपत्रों की स्वदेश वापसी न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती कूटनीतिक ताकत का भी प्रमाण है।






