सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद-शरजील इमाम को जमानत न देने पर जताई आपत्ति

जमानत देने से इनकार करने के अपने ही पूर्व निर्णय पर अब सुप्रीम कोर्ट ने खड़े किए सवाल

नई दिल्ली। दिल्ली दंगे से जुड़े मामलों में आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने के अपने ही पूर्व निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने अब गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि उस फैसले में ‘स्पीडी ट्रायल’ (त्वरित सुनवाई) के अधिकार और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों को अपेक्षित तरीके से लागू नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत गिरफ्तारी और जमानत की प्रक्रिया को लेकर देशभर में पहले से ही बहस जारी है। अदालत की इस टिप्पणी को कानूनी विशेषज्ञ आने वाले मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देख रहे हैं।

अंद्राबी को जमानत देते समय की गई टिप्पणी
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने यह अहम टिप्पणी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की। अंद्राबी छह वर्षों से अधिक समय से हिरासत में थे और उन पर मादक पदार्थों की तस्करी के जरिए आतंकवाद के वित्तपोषण का आरोप था। सुनवाई के दौरान अदालत ने 2021 के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी आरोपी के ‘स्पीडी ट्रायल’ के मौलिक अधिकार का हनन होता है, तो संवैधानिक अदालतें यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के मामलों में भी जमानत दे सकती हैं। पीठ ने स्वीकार किया कि यही सिद्धांत उमर खालिद के मामले में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाया था, जो न्यायिक दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण कमी को दर्शाता है।

बड़ी पीठ के फैसलों का पालन अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया गया था। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि उमर खालिद की पुनर्विचार याचिका अप्रैल में खारिज हो चुकी है। न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने कहा कि यह स्वीकार करना कठिन है कि एक छोटी पीठ ने तीन न्यायाधीशों वाली बड़ी पीठ के स्थापित सिद्धांतों से अलग रुख अपनाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक अनुशासन के तहत छोटी पीठ के लिए बड़ी पीठ के निर्णयों का पालन करना अनिवार्य होता है।

यूएपीए कानून पर फिर तेज हो सकती है बहस
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को केवल एक मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे यूएपीए के तहत लंबी अवधि तक हिरासत, धीमी जांच प्रक्रिया और जमानत मिलने में देरी जैसे मुद्दों पर नई बहस को बल मिल सकता है। मानवाधिकार संगठनों ने पहले भी यह चिंता जताई है कि कई मामलों में आरोपियों को सुनवाई पूरी होने से पहले ही वर्षों तक जेल में रहना पड़ता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी भविष्य में जमानत याचिकाओं के निपटारे को प्रभावित कर सकती है।

इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक और कानूनी दोनों ही हलकों में चर्चा तेज हो गई है, और यह देखना अहम होगा कि आने वाले समय में अदालतें यूएपीए मामलों में किस तरह संतुलन बनाती हैं।

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