लाहौर को फिर मिलने लगी हिंदू नाम वाली पहचान

लाहौर जिसे पाकिस्तान का दिल कहा जाता है, उस लाहौर की आत्मा सांझी सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता गवाह भी है। रावी के किनारे बसा यह शहर सदियों तक हिंदू, सिख, मुसलमान और बौद्ध सभ्यताओं की साझा थाती रहा है। 1947 से पहले लाहौर में हिंदू और सिख आबादी की एक बड़ी हिस्सेदारी थी। बाजारों में लक्ष्मी की पूजा होती थी, गली-गली में कृष्ण के मंदिर थे, जैन व्यापारियों के चौक पर धर्म की चर्चा होती थी। इन मोहल्लों, चौकों और सड़कों के नाम उस जीवंत समाज की भाषा बोलते थे-कृष्णनगर, संतनगर, लक्ष्मी चौक, जैन मंदिर चौक, धर्मपुरा आदि। लेकिन 1947 में विभाजन की आग ने सब कुछ बदल दिया। बंटवारे के बाद लाखों हिंदू और सिख परिवार रातों-रात अपनी जड़ें छोड़कर भारत आ गए। उनके जाने के साथ उनके नाम भी धीरे-धीरे मिटने लगे। विशेष रूप से 1990 के दशक में जब पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथ की लहर अपने चरम पर थी, इन ऐतिहासिक नामों को व्यवस्थित रूप से बदला जाने लगा। जहाँ कभी लक्ष्मी चौक की रौनक थी, वहाँ मौलाना जफर चौक का बोर्ड लग गया। जैन मंदिर चौक को बाबरी मस्जिद चौक का नाम दे दिया गया। कृष्णा नगर इस्लामपुरा बन गया। धर्मपुरा, मुस्तफाबाद हो गया। यह बदलाव महज नामों का परिवर्तन नहीं था,यह एक सभ्यता की स्मृति को जानबूझकर मिटाने की कोशिश थी,लेकिन पाकिस्तान की आजादी के करीब 78 साल बाद, इतिहास एक अप्रत्याशित करवट ले रहा है।

लाहौर प्रशासन ने पिछले दो महीनों के भीतर 9 प्रमुख जगहों के इस्लामी नाम बदलकर उन्हें पुराने हिंदू और ब्रिटिश काल के मूल नामों पर बहाल कर दिया है। इस पहल को लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल नाम दिया गया है और यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज की देखरेख में शुरू की गई है। इसका उद्देश्य लाहौर के पुराने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना है। इसी के चलते लाहौर नगर निगम के रिकॉर्ड और सड़कों पर अब यह इतिहास दर्ज हो चुका है। इस्लामपुरा को कृष्णनगर, सुजतनगर को संतनगर और मौलाना जफर चौक को लक्ष्मी चौक का नाम वापस मिल गया है। बाबरी मस्जिद चौक अब जैन मंदिर चौक,मुस्तफाबाद अब धर्मपुरा, और सर आगा खान चौक अब डेविस रोड कहलाएगा। इसके अलावा अल्लामा इकबाल रोड को जेल रोड, फातिमा जिन्ना रोड को क्वींस रोड और बाग-ए-जिन्ना को फिर से लॉरेंस गार्डन का पुराना नाम दे दिया गया है। इन परिवर्तनों के साथ ही शहर में नए बोर्ड भी लगा दिए गए हैं। एक ऐसा दृश्य जो कुछ साल पहले तक कल्पना से परे लगता था।
इस पूरी पहल के पीछे जो सबसे बड़ा नाम है, वह है पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ। मार्च 2025 में स्थापित लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल के संरक्षक-प्रमुख नवाज शरीफ हैं और मरियम नवाज इसे कार्यकारी निगरानी प्रदान करती हैं। इस संस्था का वार्षिक बजट 635 मिलियन रुपये आवंटित किया गया है। मरियम नवाज की सोच यह है कि लाहौर की असली ताकत उसकी बहुसांस्कृतिक विरासत में है। 48 औपनिवेशिक इमारतों की बहाली का काम चल रहा है और भाटी गेट, शालीमार बाग, और शाहदरा कॉम्पलेक्स जैसे प्रमुख स्थल भी इस पुनरुद्धार योजना में शामिल हैं।

बहरहाल,यह कदम केवल भावनात्मक नहीं है।इसके पीछे कुछ बुनियादी बातें भी छिपी हैं। इसमें पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की राजनीतिक समझ भी काम कर रही है। लाहौर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की महत्वाकांक्षा भी इस योजना के पीछे एक प्रेरणा है, जो बात सबसे अधिक चौंकाती है, वह यह है कि इस बड़े बदलाव पर पाकिस्तान के अंदर से कोई बड़ा विरोध नहीं उठा। जबकि ऐसे मामलों में धार्मिक कट्टरपंथी संगठन प्रायः सड़क पर उतर आते हैं।बीकनहाउस यूनिवर्सिटी के लेक्चरर साद मलिक कहते हैं कि प्रशासन ने भले ही कागजों में इसका नाम मौलाना जफर अली चौक कर दिया था, लेकिन उनके और उनके पिता जैसे कई लोगों के लिए यह हमेशा से लक्ष्मी चौक ही रहा। यह नाम उनकी साझी विरासत का हिस्सा है। अनारकली इलाके के रहने वाले मौलाना वाजिद कादरी ने स्पष्ट कहा कि इस्लाम को किसी मंदिर या गुरुद्वारे से कोई दिक्कत नहीं है। उनका मानना है कि 1990 के दशक में जैन मंदिर चौक का नाम बाबरी मस्जिद चौक करना महज एक सियासी फैसला था और जिन पूर्वजों ने ये हिंदू नाम रखे थे, वे भी मुसलमान ही थे, इससे उनके ईमान पर कोई आंच नहीं आई थी।लाहौर में बदलाव का यह घटनाक्रम उस वक्त हो रहा है जब पाकिस्तान भीषण आर्थिक संकट, अंतर्राष्ट्रीय अलगाव और अपनी बिगड़ती छवि से जूझ रहा है। ऐसे में लाहौर की विरासत को पुनर्जीवित करना एक तरफ जहाँ सांस्कृतिक परिपक्वता का संकेत है, वहीं दूसरी तरफ यह एक रणनीतिक कदम भी है, विश्व को यह संदेश देना कि पाकिस्तान केवल कट्टरपंथ की पहचान नहीं है। लाहौर के पुराने बाशिंदे, जो भारत में है, इन खबरों को सुनकर भावुक हो जाते हैं। उनके लिए लक्ष्मी चौक या कृष्णनगर सिर्फ नाम नहीं, उनकी पुश्तैनी यादें हैं। शायद यही वह भावनात्मक धरातल है जिस पर खड़े होकर दो देशों के बीच की दूरी कुछ कम होती दिखती है।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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