भोपाल में चर्चित त्विषा शर्मा की संदिग्ध मौत का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। इस प्रकरण में सामने आए कोर्ट के अवलोकन और दस्तावेजों ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जहां मौत का कारण फांसी बताया गया है, वहीं शरीर पर छह एंटेमॉर्टम (मृत्यु से पूर्व) चोटों की पुष्टि ने मामले को और जटिल बना दिया है। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि आरोप केवल पति समर्थ सिंह तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सास गिरिबाला सिंह के खिलाफ भी ठोस आधार मौजूद हैं। इन्हीं तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। यह मामला बीते कुछ दिनों से लगातार चर्चा में है और रोजाना नए तथ्य सामने आ रहे हैं। हाई कोर्ट के फैसले ने जांच की दिशा और गंभीरता दोनों को रेखांकित किया है। आइए जानते हैं वे पांच प्रमुख आधार, जिनके चलते कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया।

शरीर पर छह चोटों के निशान, जो फंदे से उतारने के दौरान नहीं लगे
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, त्विषा शर्मा की मृत्यु फांसी के कारण हुई, लेकिन जांच में यह भी सामने आया कि उनके शरीर पर छह अन्य चोटों के निशान मौजूद थे। इनमें चार चोटें बाएं हाथ पर, एक अनामिका उंगली पर और एक सिर पर पाई गई। ये सभी चोटें एंटेमॉर्टम यानी मृत्यु से पहले की थीं। क्वेरी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ये चोटें शव को फंदे से उतारते समय या अस्पताल ले जाते समय नहीं लगीं, जिससे संदेह और गहरा हो जाता है।

गर्भपात के लिए दबाव का आरोप
मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि मृतका गर्भवती थी और दो माह के भीतर उसका गर्भपात हो गया। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि गर्भपात के लिए ससुराल पक्ष ने दबाव बनाया, जबकि प्रतिवादी पक्ष का कहना है कि यह निर्णय मृतका का स्वयं का था। हालांकि, रिकॉर्ड में दर्ज गवाहों—रेखारानी शर्मा, मीनाक्षी शर्मा, नवनिधि शर्मा, हर्षित शर्मा और राशि अबरोल—के प्रारंभिक बयानों से संकेत मिलता है कि मृतका को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था और उस पर गर्भपात के लिए दबाव डाला जा रहा था।
केवल पति नहीं, सास की भूमिका भी संदिग्ध
14 और 15 मई को दर्ज किए गए आगे के बयानों में प्रतिवादी और उसके पुत्र दोनों के खिलाफ स्पष्ट आरोप लगाए गए। व्हाट्सएप चैट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि आरोप केवल पति के खिलाफ हैं। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने इन सभी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया था, जिसे हाई कोर्ट ने गंभीरता से लिया।
जांच में सहयोग न करना भी बना कारण
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अग्रिम जमानत मिलने के बावजूद आरोपी जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रही थीं। उन्हें कई बार नोटिस जारी किए गए, लेकिन उन्होंने न तो अपना बयान दर्ज कराया और न ही जांच में सक्रिय सहयोग किया। यह रवैया भी जमानत याचिका खारिज होने का एक महत्वपूर्ण कारण बना।
आर्थिक लेन-देन से दहेज मांग
कोर्ट ने धनराशि के लेन-देन पर भी टिप्पणी की। विवाह 9 दिसंबर 2025 को हुआ था, जबकि विभिन्न तिथियों—9 अक्टूबर 2025, 16 दिसंबर 2025, 14 जनवरी 2026, 25 जनवरी 2026, 12 फरवरी 2026, 26 फरवरी 2026 और 1 मार्च 2026—को पैसों का लेन-देन हुआ। प्रतिवादी पक्ष ने इसे सामान्य लेन-देन बताया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दहेज की मांग नहीं की गई थी। विशेष रूप से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि मृत्यु के समय के आसपास धनराशि के ट्रांसफर का स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं हो पाया।
इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने यह माना कि मामला गंभीर है और आरोपी के खिलाफ पर्याप्त आधार मौजूद हैं। इसी के चलते गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई। यह फैसला न केवल इस केस की दिशा तय करेगा, बल्कि आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करेगा।






