इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर से जली हुई नकदी मिलने के मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जांच समिति गठित की है। यदि संसद उन्हें पद से हटा देती है, तो उन्हें पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिलेंगे। ऐसे में इस्तीफा देना ही उनके पास एकमात्र विकल्प होगा।
यह समिति सुप्रीम कोर्ट के जज अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनींद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य से मिलकर बनी है। लोकसभा अध्यक्ष ने बताया कि 21 जुलाई को 146 सांसदों, जिनमें भाजपा के रवि शंकर प्रसाद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी शामिल थे, ने वर्मा को हटाने की मांग की थी।
संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाईकोर्ट जज अपना इस्तीफा हस्ताक्षरित पत्र के माध्यम से दे सकते हैं, जिसकी स्वीकृति आवश्यक नहीं होती। इस्तीफे में तिथि का उल्लेख भी किया जा सकता है और उस तिथि से पहले इसे वापस लिया जा सकता है। इस्तीफा देने पर उन्हें पेंशन और अन्य लाभ मिलेंगे, लेकिन संसद द्वारा हटाए जाने पर यह सभी लाभ समाप्त हो जाएंगे।
पूर्व में तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने की सलाह दी थी, जो उन्होंने ठुकरा दी। न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत, किसी जज को हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव पारित होने पर तीन सदस्यीय समिति आरोपों की जांच करती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
मार्च में, दिल्ली हाईकोर्ट में तैनाती के दौरान वर्मा के घर आग लगने पर नकदी के जले हुए बंडल मिले थे, जिनके बारे में उन्होंने जानकारी से इनकार किया था। सुप्रीम कोर्ट समिति की जांच में वे दोषी पाए गए, जिसके बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी और कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन महाभियोग का सामना कर चुके हैं, लेकिन दोनों ने इस्तीफा दे दिया था। जज वर्मा के खिलाफ यह पहला महाभियोग नए संसद भवन में होगा।






